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रामानुज का ईश्वर एक साकार सत्ता था, जो अपनी सृष्टि के प्रति प्रेम से भरा था। वह पश्चातापी पापियों को अपनी ओर खींचने हेतु कर्म की शक्ति को भी परे कर सकता था। शंकर के निर्गुण विश्वात्मा के विपरीत, जो मायामय जगत को एक प्रकार की लीला में रचता है, रामानुज के ईश्वर को मनुष्य की उतनी ही आवश्यकता थी जितनी मनुष्य को ईश्वर की। अर्थ पर बल देते हुए रामानुज ने कृष्ण के शब्दों की व्याख्या यह अर्थ देने हेतु की कि जैसे मनुष्य ईश्वर के बिना नहीं रह सकता, वैसे ईश्वर मनुष्य के बिना नहीं रह सकता।

रामानुज के सिद्धांत को विकसित कर तेरहवीं शताब्दी में पढ़ाने वाला आचार्य कौन था?

Aशंकर
Bमध्व
Cबसव
Dअभिनवगुप्त
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