बाघ अभयारण्य हमारे पर्यटन उद्योग का एक महत्वपूर्ण भाग हैं। भारत में 42 घोषित बाघ अभयारण्य हैं जिनका संचालन सामान्यतः राज्य वन विभागों द्वारा किया जाता है। भारतीय बाघ, जिसे बंगाल टाइगर (Bengal tiger) भी कहा जाता है, भारत का राष्ट्रीय पशु है।
इसका वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस (Panthera tigris) है। बाघों को उनके वैज्ञानिक, आर्थिक, सौंदर्यपरक, सांस्कृतिक तथा पारिस्थितिक मूल्यों के लिए अभयारण्यों में संरक्षित किया जाता है और उन्हें जनता की शिक्षा एवं आनंद हेतु राष्ट्रीय धरोहर के रूप में रखा जाता है। किंतु हाल के वर्षों में अवैध शिकार के कारण बाघों की हत्या में तीव्र वृद्धि के फलस्वरूप बाघ पर्यटन एक समस्याग्रस्त मुद्दा बन गया है।
यह न केवल पर्यटन विभाग के लिए, अपितु विभिन्न वन्यजीव संगठनों तथा अन्य शासी निकायों के लिए भी एक चेतावनी है। चूँकि सरकारें पर्याप्त प्रवर्तन एवं जाँच लागू करने में विफल रही हैं, वन्यजीव अपराधों में वर्षों से वृद्धि होती गई है।
आज कुछ कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद वन्यजीव अभयारण्यों में जनता के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध की माँग कर रहे हैं। किंतु ऐसा पूर्ण प्रतिबंध एक प्रतिगामी कदम होगा। इसमें संदेह नहीं कि व्यावसायिक पर्यटन का कठोर विनियमन आवश्यक है, तथापि पूर्ण प्रतिबंध अत्यंत हानिकारक कदम होगा, क्योंकि इससे संरक्षण, शिक्षा, निगरानी तथा अन्य संरक्षण गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
गद्यांश के अनुसार, वन्यजीव अपराधों की समस्या का समाधान किसके द्वारा पाया जा सकता है?
समाधान व्यावसायिक पर्यटन का नियमन है, अतः यही उत्तर है।
गद्यांश कहता है कि व्यावसायिक पर्यटन को कड़ाई से नियंत्रित किया जाना चाहिए।
यह पूर्ण प्रतिबंध को हानिकारक कदम मानकर अस्वीकार करता है।
प्रतिबंध संरक्षण, शिक्षा और निगरानी को हानि पहुँचाएगा।
नियमन हानि को नियंत्रित करता है और पर्यटन के लाभ भी बनाए रखता है।
अतः प्रतिबंध के बजाय नियमन ही अनुशंसित समाधान है।
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