क्षेत्र पारिस्थितिकीविद (field ecologist) ने उन प्रजातियों पर प्रकाश डालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिनसे हम प्रेम एवं प्रशंसा करते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि संरक्षण केवल कुछ करिश्माई प्रजातियों—बिल्लियों, हाथियों, व्हेल अथवा ऑलिव रिडले कछुओं—की देखभाल के विषय में नहीं होना चाहिए।
यह उन प्राणियों के मूल्य को जानने के विषय में भी है जिन्हें हममें से अनेक कष्टप्रद, यहाँ तक कि खतरनाक मान सकते हैं। सहस्राब्दियों से समुदायों ने व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक कारणों से पशुओं एवं पौधों की रक्षा का प्रयास किया है।
तथापि, लगभग दो शताब्दियों से विश्व के एक मानवकेंद्रित दृष्टिकोण ने एक प्रकार का पारिस्थितिक असंतुलन उत्पन्न किया। उपयोगितावादी विचार प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण पर हावी होने लगे, जिसका प्रायः अर्थ यह होता था कि संरक्षण का भी कठोरतापूर्वक व्यावसायिक उद्देश्य होता था। आधुनिक पर्यावरणीय चेतना संभवतः लगभग छह दशक पुरानी है।
भारत में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (Bombay Natural History Society) जैसे संगठन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के हैं, और शिकारी से संरक्षणवादी बने लोगों के प्रयासों ने अनेक प्रजातियों के मूल्य को रेखांकित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु पारिस्थितिकी को मुख्यधारा में लाने के व्यवस्थित प्रयास बहुत बाद में आरंभ हुए और सलीम अली तथा एम. कृष्णन जैसे अग्रदूतों के कार्यों के बहुत ऋणी हैं।
गद्यांश के अनुसार, समुदाय पिछले कितने समय से पौधों और पशुओं की रक्षा में शामिल रहे हैं?
यह कई हज़ार वर्ष रहा है, अतः यही उत्तर है।
गद्यांश कहता है कि समुदायों ने सहस्राब्दियों से कार्य किया।
सहस्राब्दियाँ अर्थात् कई हज़ार वर्ष।
उन्होंने यह व्यावहारिक और आध्यात्मिक कारणों से किया।
अतः अवधि कई हज़ार वर्ष है।
अतः पहला विकल्प सही है।
Want more like this? Create a free account to practise a full test, track your progress, and get spaced-repetition review.
Practise on Mcqkart →🎓 Book an expert →