वर्तमान अध्ययन में हमारा सरोकार केवल सत्ता-संबंधों से है, क्योंकि यही सामाजिक संरचना का भाग हैं और अतः संपूर्ण समाजों तथा उनके भीतर की संस्थाओं के संगठन से समूह-संघर्षों की व्यवस्थित व्युत्पत्ति की अनुमति देते हैं। ऐसे समूह-संघर्षों का महत्व इस तथ्य में निहित है कि वे शक्ति के संरचनात्मक रूप से आकस्मिक संबंधों की उपज नहीं हैं, बल्कि जहाँ भी सत्ता का प्रयोग होता है वहीं उभरते हैं, और इसका अर्थ है सभी समाजों में सभी ऐतिहासिक परिस्थितियों में।
सत्ता-संबंध सदैव अधीक्षण और अधीनता के संबंध होते हैं। जहाँ सत्ता-संबंध होते हैं, वहाँ अधीक्षक तत्व से सामाजिक रूप से अपेक्षा की जाती है कि वह आदेशों, आज्ञाओं, चेतावनियों और निषेधों के माध्यम से अधीनस्थ तत्वों के व्यवहार को नियंत्रित करे। ऐसी अपेक्षाएँ व्यक्तियों के चरित्र के बजाय अपेक्षाकृत स्थायी सामाजिक पदों से जुड़ी होती हैं; इस अर्थ में वे वैध होती हैं।
इसी तथ्य के कारण उनमें सदैव नियंत्रणाधीन व्यक्तियों और उन क्षेत्रों का विनिर्देशन निहित होता है जिनके भीतर नियंत्रण अनुमेय है। सत्ता, शक्ति से भिन्न, कभी दूसरों पर सामान्यीकृत नियंत्रण का संबंध नहीं होती। सत्ता एक वैध संबंध होने के कारण, सत्तात्मक आज्ञाओं की अवज्ञा पर अनुशास्ति लगाई जा सकती है; वैध सत्ता के प्रभावी प्रयोग को सहारा देना वस्तुतः विधिक प्रणाली, और अर्ध-विधिक प्रथाओं तथा मानदंडों, के प्रकार्यों में से एक है।
गद्यांश के अनुसार, सत्ता का प्रयोग किसे उत्पन्न करता है?
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