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लोक परंपराओं द्वारा सार्वजनिक स्थल सृजित एवं उपलब्ध कराए जाते हैं, जहाँ कुछ व्यापक सामाजिक मूल्यों का सृजन एवं पालन किया जा सकता है। सार्वजनिक स्थलों का सृजन लोक परंपराओं के विभिन्न विचारों, मूल्यों एवं आलोचनात्मक विचारों को सार्वजनिक विमर्श हेतु अग्रभूमि में लाने में सहायता करता है।

यह तनावरहित ढंग से समस्त प्रतिरोध से मुक्ति पाने का साधन है। आधुनिकता के कारण पश्चिम में जो परिवर्तन होते हैं, वे सार्वजनिक स्थल के अनेक सृजनात्मक एवं आनंददायक उपयोगों के लिए सामाजिक रूप से उत्तरदायी हैं।

राजनीति एवं धर्म उल्लेखनीय उदाहरण हैं जिनमें कुछ उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सार्वजनिक स्थल का सृजन एवं अनुरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। सार्वजनिक स्थल में अंतर्निहित गतिशीलता जटिल बारीकियों एवं अनेक प्रवृत्तियों को उजागर करती है, विशेषकर जब परिवर्तन की प्रकृति का विश्लेषण किया जाता है। सामान्य आनंद-उन्मुख रूप प्रतीत होता है कि प्रदर्शनकारियों एवं संरक्षकों के बहुस्तरीय हितों की पूर्ति हेतु बदल रहा है।

परिवर्तन अर्थव्यवस्था, राजनीति तथा असहमति के स्वर द्वारा प्रभावित होते हैं, जिनमें व्यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सार्वजनिक स्थल के विनियोजन की विभिन्न युक्तियाँ अपनाई जाती हैं। परिणामस्वरूप, विवाद एवं चर्चा का आधार संबद्ध इकाइयों से परे, अधिक व्यापक हो जाता है।

गद्यांश के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र में परिवर्तनों के क्या प्रभाव हैं?

Aप्रदर्शनकर्ताओं और संरक्षकों के बहुस्तरीय हित पूरे होते हैं। ✓ Correct
Bस्थिर नियम प्रबल होते हैं।
Cआर्थिक और दार्शनिक विचारों का अभाव होता है।
Dसुख आमतौर पर समाप्त हो जाता है।
Correct answer: (A) प्रदर्शनकर्ताओं और संरक्षकों के बहुस्तरीय हित पूरे होते हैं।
Explanation

प्रदर्शनकर्ताओं और संरक्षकों के बहुस्तरीय हित पूरे होते हैं, अतः यही उत्तर है।

गद्यांश कहता है कि सुख-उन्मुख रूप बदल रहा है।

यह प्रदर्शनकर्ताओं और संरक्षकों के बहुस्तरीय हितों को पूरा करने हेतु बदलता है।

अतः परिवर्तन इन विविध हितों की सेवा करते हैं।

अन्य विकल्प पाठ से मेल नहीं खाते।

अतः पहला विकल्प सही है।

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