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हाल ही में घनश्याम शाह (1990) ने भारत के सामाजिक आंदोलनों पर साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सुप्रलेखित समीक्षा प्रकाशित की है, जिसमें अन्य आयामों के साथ-साथ जनजातीय आंदोलनों के विभिन्न प्रकार-निरूपण भी वर्णित हैं। एल.के. महापात्रा (1972) सामाजिक आंदोलनों हेतु व्यापक रूप से प्रयुक्त प्रकार-निरूपणों को जनजातीय आंदोलनों पर लागू करते हैं। वे इन्हें प्रतिक्रियावादी, रूढ़िवादी, तथा संशोधनवादी या क्रांतिकारी के रूप में वर्णित करते हैं।

प्रतिक्रियावादी आंदोलन 'अच्छे पुराने दिनों' को वापस लाने का प्रयास करता है, जबकि रूढ़िवादी आंदोलन यथास्थिति बनाए रखने का प्रयास करता है। संशोधनवादी या क्रांतिकारी आंदोलन वे हैं जो 'बुरी' या 'निम्न' प्रथाओं, मान्यताओं या संस्थाओं को समाप्त करके सांस्कृतिक या सामाजिक व्यवस्था के सुधार या शुद्धिकरण हेतु संगठित होते हैं। सुरजीत सिन्हा (1968) आंदोलनों को नृजातीय विद्रोह, सुधार आंदोलन, भारतीय संघ के भीतर राजनीतिक स्वायत्तता आंदोलन, विच्छेदवादी आंदोलन, और कृषि असंतोष में वर्गीकृत करते हैं।

के.एस. सिंह (1983) लगभग यही वर्गीकरण करते हैं, सिवाय इसके कि वे सुधार आंदोलन के स्थान पर संस्कृतीकरण और नृजातीय आंदोलनों के स्थान पर सांस्कृतिक आंदोलन पद का प्रयोग करते हैं। संक्षेप हेतु घनश्याम शाह ने प्रकार-निरूपणों को नृजातीय आंदोलनों, कृषि आंदोलनों और राजनीतिक आंदोलनों के रूप में पुनर्निरूपित किया है। इन तीनों प्रकारों में न केवल अत्यधिक अतिव्यापन है, बल्कि वे परस्पर-जुड़े भी हैं, और एक दूसरे की ओर ले जाता है।

गद्यांश के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन सुरजीत सिन्हा के आंदोलनों के वर्गीकरण का भाग नहीं है?

Aसुधार आंदोलन
Bविच्छेदवादी आंदोलन
Cनृजातीय विद्रोह
Dप्रतिक्रियावादी आंदोलन
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