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भारतीय शासन प्रणाली में, जवाबदेही और विशिष्ट अधिकारों की सुरक्षा को विशेषीकृत संवैधानिक और सांविधिक निकायों (Constitutional and Statutory Bodies) के एक जाल के माध्यम से सुदृढ़ किया जाता है। इन दो प्रकार के निकायों के बीच उनके उद्भव के आधार पर भेद है। संवैधानिक निकाय सीधे संविधान के प्रावधानों द्वारा स्थापित होते हैं, जो उन्हें उच्चतर स्तर की स्वायत्तता और स्थिरता प्रदान करता है। इसका एक प्रमुख उदाहरण नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General, CAG) है, जिसका कर्तव्य भारत सरकार और राज्य सरकारों की सभी प्राप्तियों और व्यय का अंकेक्षण करना है। इसी प्रकार, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission for Scheduled Castes, NCSC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes, NCST) संवैधानिक निकाय हैं जिन्हें इन समुदायों के हितों और अधिकारों की रक्षा का कार्य सौंपा गया है। इसके विपरीत, सांविधिक निकाय संसद के किसी अधिनियम द्वारा सृजित होते हैं और अपना प्राधिकार उस विशिष्ट संविधि से प्राप्त करते हैं। उदाहरणों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Commission for Human Rights, NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women, NCW), और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Minorities, NCM) सम्मिलित हैं। यद्यपि उनका उद्भव भिन्न है, दोनों प्रकार के निकाय एक महत्वपूर्ण प्रहरी भूमिका निभाते हैं, शिकायतों की जाँच करते हैं, सुरक्षा-उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करते हैं, और अपने-अपने क्षेत्रों के लिए न्याय सुनिश्चित करने तथा संवैधानिक और विधिक अधिदेशों को बनाए रखने हेतु सरकार को सिफ़ारिशें करते हैं।

अनुच्छेद के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन एक संवैधानिक निकाय है?

Aराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग।
Bनियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक।
Cराष्ट्रीय महिला आयोग।
Dराष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग।
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