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समाज की पूंजीवादी व्यवस्था मनुष्यों के बीच स्वस्थ संबंधों का पोषण नहीं करती है। बहुत थोड़े लोग उत्पादन के सभी साधनों के स्वामी होते हैं और अन्य, यद्यपि नाम मात्र के लिए कुछ को स्वयं पर थोपी गई शर्तों के अधीन अपनी श्रम शक्ति को बेचना पड़ता है।

चूँकि पूंजीवाद का जोर भौतिक संपदा के सर्वोच्च महत्त्व पर होता है इसलिए इसकी अपील की तीव्रता अर्जनशील तीव्रता की ओर होती है। यह आर्थिक शक्ति की उपासना को बढ़ावा देती है और इसके अर्जन के लिए नियोजित साधनों पर कोई ध्यान नहीं देती है और यह लक्ष्य पूर्ति को बढ़ावा देती है। मानवीय सहन शीलता की चरम सीमा तक मनुष्यों के इसके शोषण से, इसका संकेन्द्रण अधिकतम उत्पादन पर न होकर सर्वाधिक मुनाफे पर होता है।

अत: मानव परिवार का विभाजन आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाता है। यह सब मानवीय गरिमा के विभाजन के लिए हानिकारक है। और जब उत्पीड़ित निर्धन सहायता के लिए धर्म के संस्थापकों की ओर मुड़ता है, तो वे स्थापित व्यवस्था का चालाकी पूर्वक बचाव करते हैं।

वे उनके वर्तमान दुखों के लिए भावी सुखों का वचन देते हैं और संतप्त मनुष्यों के दुःख व विद्रोह पर मरहम लगा कर संतुलन बनाए रखने हेतु स्वर्ग का मायाजाल बुनते हैं। व्यवस्था अन्याय थोपती है और धर्म उसे उचित ठहराता है।

गद्यांश को पढ़ने के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पूंजीवादी व्यवस्था ______

Aमहत्वाकांक्षी है
Bपक्षपातपूर्ण है ✓ Correct
Cमानवीय है
Dयथार्थपरक है
Correct answer: (B) पक्षपातपूर्ण है
Explanation

गद्यांश दिखाता है कि व्यवस्था मानव परिवार को आर्थिक स्थिति के आधार पर बांटती है और श्रमिकों का शोषण करती है, जिसे लेखक अन्यायपूर्ण मानता है। ऐसी एकतरफा व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है, इसलिए शेष विकल्प, जो इसे मानवीय या संतुलित बताते हैं, उपयुक्त नहीं हैं।

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