1560 से लगभग 1575 तक अकबर के अधीन राज्य-नीति को इस प्रकार प्रायः मुसलमानों में अधिक प्रभाव रखने वाले धर्मशास्त्रियों के पूर्वाग्रहों के अनुरूप ढलना पड़ता था। वे प्रायः उसे अविश्वासियों और तथाकथित विधर्मियों के प्रति कठोर और सांप्रदायिक होने को उकसाते थे। बदायूनी के अनुसार इस चरण में अकबर ने धर्मशास्त्रियों पर अभूतपूर्व पैमाने पर भू-अनुदानों के रूप में बहुत कृपा बरसाई। इस कृपा-बाढ़ से लाभान्वित अधिकांश व्यक्ति स्पष्टतः विभिन्न स्थानों पर मस्जिदों और दरगाहों का प्रबंध करने वाले भारतीय मुसलमान होते। यहाँ तक कि यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि आइम्मा (इस्लामी धार्मिक संस्थाओं के कार्यकर्ता) को संतुष्ट करने का यह रवैया आंशिक रूप से उन्हें अफ़ग़ान सरदारों के प्रभाव से दूर करने हेतु था जो हाल के वर्षों तक उनके शासक थे। इन वर्षों में मुग़ल उन्हें मुस्लिम आबादी में अमीरों या अशराफ़ में अपने मुख्य संभावित विरोधी मानते थे।
पूर्वाग्रही धर्मशास्त्री किसके प्रति कठोर और सांप्रदायिक नहीं थे?
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