अनेक मानव संस्कृतियों में कृषि एक निष्कर्षक उद्योग की भाँति की जाती है, जिसमें बार-बार फसल उगाने से मृदा का पोषण खिंच जाता है, और विश्व भर में मृदाएँ नियमित रूप से क्षरित होती हैं।
भूमि का कृषि हेतु रूपांतरण संपूर्ण पारितंत्र को बदल देता है, और मृदा-संरचना एवं उर्वरता, सतही तथा भूजल की गुणवत्ता एवं मात्रा, और स्थलीय तथा जलीय समुदायों की जैव-विविधता पर पड़ने वाला प्रभाव वर्तमान और भावी उत्पादकता को घटा देता है। फसल-चक्र और पशुधन-खाद का प्रयोग मृदा-क्षरण घटाने में सहायक होते हैं, पर विश्व के कुछ भागों में बढ़ती जनसंख्या द्वारा खाना पकाने और गर्म रहने हेतु जलाने के लिए भूमि से गोबर तक छीन लिया जाता है।
क्षरित मृदा को कहीं न कहीं जाना ही होता है, और उसके सामान्य गंतव्य नदी-तल तथा झील-तल हैं, जहाँ वह प्रायः जलाशयों को अवरुद्ध कर द्वितीयक समस्याएँ उत्पन्न करती है।
कृषि एक निष्कर्षक उद्योग की भाँति की जाती है और परिणामस्वरूप:
गद्यांश कहता है कि बार-बार फसल उगाने से मृदा का पोषण खिंच जाता है, अर्थात मृदा को परती न छोड़ने से।
कृषि को निष्कर्षक (extractive) मानने का अर्थ है पोषक तत्वों को उनकी पुनःपूर्ति से तेज गति से निकालना।
परती अवधि के बिना निरंतर खेती मृदा की उर्वरता को समाप्त कर देती है।
परती अवधि मृदा को विश्राम देकर उसके पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से पुनः भरने देती है।
गद्यांश इस हानि का कारण मशीनरी को नहीं बताता, न ही कहता है कि पोषण पुनः भर जाता है।
अतः सही प्रभाव यह है कि मृदा को परती न छोड़ने से उसका पोषण खिंच जाता है।
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