न्याय के अनुसार, समस्त त्रुटियाँ आत्मनिष्ठ होती हैं। वात्स्यायन कहते हैं: "जो सत्य ज्ञान द्वारा दूर किया जाता है, वह असत्य अवबोध है, न कि वस्तु"।
मरीचिका को दृष्टांत के रूप में लेते हुए उद्योतकर प्रेक्षित करते हैं कि समस्त स्थिति में वस्तु वही रहती है जो वास्तव में वह है। सूर्य की चमकती किरणों के संबंध में, जब जल का संज्ञान उत्पन्न होता है, वस्तु में कोई त्रुटि नहीं होती। ऐसा नहीं है कि किरणें, किरणें नहीं हैं, न ही ऐसा कि चमक, चमक नहीं है; त्रुटि संज्ञान में निहित होती है, किसी वस्तु के ऐसे संज्ञान के रूप में जो वह नहीं है।
न्याय का यथार्थवाद यहाँ थोड़ा रूपांतरित है, क्योंकि वह इस विचार के आधार पर भ्रम की अनुभूति को नहीं समझा सकता कि अनुभूत वस्तुओं का जगत अनुभूतिकर्ता से स्वतंत्र रूप से विद्यमान होता है। समस्त त्रुटिमय संज्ञान का यथार्थता में कुछ आधार होता है। वात्स्यायन कहते हैं: "कोई मिथ्या अवबोध पूर्णतया आधारहीन नहीं है"। कोई वस्तु जैसी है उससे इतर उसका अवबोधन ही त्रुटि है, और अन्यथाख्याति का यह दृष्टिकोण न्याय द्वारा समर्थित है।
"सभी त्रुटि, संज्ञान में निहित होती हैं।" उपरोक्त के संदर्भ में निम्नलिखित में से सत्य विकल्प चुनें:
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