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श्री अरविंद घोष भारतीय पुनर्जागरण और भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में एक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे। उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। उन्होंने इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त की और 1893 में भारत लौटे। अरविंद का राजनीतिक जीवन दो कालों में विभाजित है, पहला उनके भारत आगमन से आरंभ होकर पांडिचेरी में उनके आश्रम तक फैला है। वे भारतीय क्रांतिकारियों की एक गुप्त संस्था से जुड़े थे। उन्होंने समाचार-पत्र 'बंदे मातरम' (Bande Mataram) का संपादन किया, जो 1905 में स्थापित हुआ। बंदे मातरम पत्रकारिता के इतिहास में लगभग अद्वितीय था, क्योंकि उसने लोगों के मन को बदला और उन्हें क्रांति के लिए तैयार किया। उपनिषद, भगवद् गीता और अन्य प्राचीन हिंदू ग्रंथों ने अरविंद के विचार को प्रभावित किया। उन्होंने दो साप्ताहिक निकाले, बंगाली में 'धर्म' और अंग्रेज़ी में 'कर्मयोगिन' (Karmayogin)। 1910 में उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी और योगी बन गए। द आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी, द लाइफ डिवाइन, द ह्यूमन साइकिल, एसेज़ ऑन द गीता, द फाउंडेशन्स ऑफ इंडियन कल्चर, द फ्यूचर पोएट्री और योग एवं वेद पर रचनाएँ श्री अरविंद की प्रमुख कृतियाँ थीं।

गद्यांश के अनुसार, भारत लौटने के बाद अरविंद द्वारा विस्तारित आश्रम किस स्थान पर स्थित था?

Aपांडिचेरी
Bकोलकाता
Cबंगाल
Dइनमें से कोई नहीं
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