मानव बुद्धि या गवेषणा के सभी विषयों को दो प्रकारों में बांटा जा सकता है - प्रत्ययों के सम्बन्ध और वस्तु स्थिति। पहले प्रकार के अंतर्गत ज्यामिति, बीजगणित और अंक गणित संक्षेपतः प्रत्येक प्रतिज्ञान जो या तो अन्तः प्रज्ञात्मक या निरूपणात्मक रूप से निश्चित हों, आते हैं। कर्ण का वर्ग दो भुजाओं के वर्ग के बराबर होता है - यह एक ऐसा तर्क वाक्य है जो इन आकृतियों के बीच सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है। पांच का तीन गुना तीस के आधे के बराबर होता है - यह इन संख्याओं के बीच सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है।
इस प्रकार के तर्क वाक्य की खोज केवल ऐसी विचार संक्रिया द्वारा ही की जा सकती है जो ब्रह्माण्ड के किसी भी अस्तित्व पर निर्भर नहीं करते हैं। यद्यपि प्रकृति में कहीं भी वृत्त या त्रिभुज नहीं है, फिर भी यूक्लिड द्वारा दर्शाए गए सत्य हमेशा अपनी निश्चितता और साक्ष्य बनाए रखेंगे। वस्तु स्थिति जो मानव बुद्धि के दूसरे विषय हैं, को इसी प्रकार निश्चित नहीं किया जाता है, न ही उनकी सत्यता का हमारे पास साक्ष्य है।
चाहे जितना भी महान हो, किसी भी वस्तु स्थिति का विलोम अभी भी संभव है; क्योंकि इसमें विरोधाभास का पुट नहीं हो सकता है, और मन इसे उतनी ही सुगमता और स्पष्टता से ग्रहण करता है मानो हमेशा यथार्थ के साथ सहज हो। यह तथ्य कि कल सूर्योदय नहीं होगा - यह तर्क वाक्य इस प्रतिज्ञान कि कल सूर्योदय होगा - से कम सुग्राह्य और अधिक विरोधाभासी नहीं है। अतः हमें व्यर्थ ही इसके झूठेपन को दर्शाने का प्रयास करना चाहिए।
इस गद्यांश के परिप्रेक्ष्य के अनुसार वस्तु स्थिति से सम्बंधित तर्क की प्रकृति किसपर आधारित है:
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