पुरुषों और महिलाओं को पूर्ण और वैयक्तिक मनुष्य के रूप में चित्रित किया जाना चाहिए। उन्हें उनके लिंग (सेक्स) के पारंपरिक गुणों से चित्रित नहीं किया जाना चाहिए। महिलाओं को पुरुषों की ही तरह समान व्यावहारिक, सकारात्मक और वस्तुनिष्ठ अभिवृत्तियाँ होने के रूप में दर्शाया जाना चाहिए।
इसी तरह, पुरुषों का भी अविवेकी, विषयनिष्ठ और नकारात्मक अभिवृत्तियाँ होने के रूप में प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए। बच्चों के चित्रण में लड़कियों को प्रायः सक्षम और यहाँ तक कि दबंग के रूप में दर्शाया जाना चाहिए। पुरुषों और महिलाओं दोनों के साथ समान सम्मान और गरिमा का व्यवहार किया जाना चाहिए।
प्रत्येक लिंग के जीर्ण पारंपरिक गुणों की समाप्त होनी चाहिए, जहाँ तक संभव हो, उनकी शारीरिक गुणों से बचना चाहिए। यौन वस्तु के रूप में महिलाओं को मानने का लैंगिक उपागम, उनके संबंध में लतीफा कहने और उनके मुद्दों पर व्यंग्य कसने से बचना चाहिए। इसी तरह पुरुषों का महिलाओं पर अत्यधिक निर्भर और उनके प्रभुत्व के अधीन होने के रूप में चित्रण और उपहास नहीं किया जाना चाहिए। लैंगिक सीमांकन द्वारा गतिविधि के विभिन्न क्षेत्रों को चित्रित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि पुरुषों और महिलाओं दोनों को सम्मिलित करना चाहिए।
लेखकों को महिलाओं की सक्षमता और प्रवीणता पर आश्चर्यचकित होकर विश्वास न करने की अभिवृत्ति से बचना चाहिए। महिलाओं को सक्रिय प्रतिभागी बताया जाना चाहिए, न कि पुरुषों के अधीन होने के रूप में। इसके अतिरिक्त, महिलाएँ पुरुषों जितनी ही प्रारंभकर्ता और प्रवर्तक हैं।
यह कह कर – ''यौनिक सीमांकन द्वारा गतिविधि के विभिन्न क्षेत्रों को चित्रित नहीं किया जाना चाहिए,'' लेखक किससे बचना चाहता है?
जब लेखक कहता है कि गतिविधि के क्षेत्रों को यौनिक रेखाओं से नहीं बाँटा जाना चाहिए, तो आशय यह है कि काम और भूमिकाओं को पुरुषों के क्षेत्र और महिलाओं के क्षेत्र में नहीं बाँटना चाहिए। यही बँटवारा ठीक जेन्डर भूमिकाओं का निर्धारण है, जिससे लेखक बचना चाहता है, इसलिए पहला विकल्प सही है। बाकी विकल्प, पारंपरिक गुण, सामाजिक असमानताएँ और वर्ग भेदभाव, अधिक व्यापक या भिन्न विचार हैं और इस विशेष पंक्ति का विषय नहीं हैं।
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