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अनेक मानव संस्कृतियों में कृषि एक निष्कर्षक उद्योग की भाँति की जाती है, जिसमें बार-बार फसल उगाने से मृदा का पोषण खिंच जाता है, और विश्व भर में मृदाएँ नियमित रूप से क्षरित होती हैं।

भूमि का कृषि हेतु रूपांतरण संपूर्ण पारितंत्र को बदल देता है, और मृदा-संरचना एवं उर्वरता, सतही तथा भूजल की गुणवत्ता एवं मात्रा, और स्थलीय तथा जलीय समुदायों की जैव-विविधता पर पड़ने वाला प्रभाव वर्तमान और भावी उत्पादकता को घटा देता है। फसल-चक्र और पशुधन-खाद का प्रयोग मृदा-क्षरण घटाने में सहायक होते हैं, पर विश्व के कुछ भागों में बढ़ती जनसंख्या द्वारा खाना पकाने और गर्म रहने हेतु जलाने के लिए भूमि से गोबर तक छीन लिया जाता है।

क्षरित मृदा को कहीं न कहीं जाना ही होता है, और उसके सामान्य गंतव्य नदी-तल तथा झील-तल हैं, जहाँ वह प्रायः जलाशयों को अवरुद्ध कर द्वितीयक समस्याएँ उत्पन्न करती है।

फसल-चक्र किसे घटाने में सहायक होता है?

Aपशुधन मृत्यु-दर
Bमृदा-क्षरण ✓ Correct
Cफसलों के मृदा-संबंधी रोग
Dगोबर
Correct answer: (B) मृदा-क्षरण
Explanation

गद्यांश कहता है कि फसल-चक्र और पशुधन-खाद का प्रयोग मृदा-क्षरण घटाने में सहायक होते हैं।

अतः फसल-चक्र मृदा-क्षरण घटाता है, जो दूसरे विकल्प से मेल खाता है।

फसलें बदलने से मृदा पर पड़ने वाली माँग बदलती है और मृदा ढकी तथा स्थिर रहती है।

इससे मृदा-संरचना बनी रहती है और वायु तथा जल द्वारा ऊपरी मृदा की हानि घटती है।

पशुधन मृत्यु-दर, फसल-रोग और गोबर का गद्यांश में फसल-चक्र से संबंध नहीं जोड़ा गया।

उत्तर गद्यांश के मध्य भाग में स्पष्ट रूप से कहा गया है।

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