समापन करते हुए, सर्वप्रथम यह ध्यान में रखा जाए कि सघन पारिस्थितिक आंदोलन की शर्तें और प्रवृत्तियां पारिस्थितिकी या तर्क या आगमन से व्युत्पन्न नहीं हुई हैं, पारिस्थितिकी विज्ञान और पारिस्थितिकीय क्षेत्र कार्यकर्ताओं की जीवन शैली ने सघन पारिस्थितिकी आंदोलन के संदर्श पर सुझाव, प्रेरणा और रक्षण प्रदान किया है।
दूसरा, इस बात की पूरी तरह सराहना की जानी चाहिए कि सघन पारिस्थिति की आंदोलन के महत्त्वपूर्ण नियम स्पष्ट तथा सशक्त रूप के मानकीय हैं। इनमें वैज्ञानिक शोध के परिणामों (परिणामों की न्यूनतम) पर आंशिक आधार पर मूल्य प्राथमिकता प्रणाली को अभिव्यक्ति दी जाती है। आज पारिस्थितिकीविद नीति निर्माता निकायों को प्रदूषणता और संसाधनों के क्षरण की चिंताओं, खतरे के पूर्वानुमानों के जरिये प्रभावित करते हैं। यह जानते हुए कि नीति निर्माता स्वास्थ्य और न्यायपूर्ण वितरण से संबंधित कुछ न्यूनतम शर्तों को मान लेते हैं। इस आंदोलन में कुछ राजनीति की संभावना भी होती है जिसे नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिए और इसका प्रदूषण और संसाधन क्षरण में कुछ खास काम नहीं होता।
तीसरी, पारिस्थितिकी आंदोलन में जो ध्यान देना है, वे पारिस्थितिकी की बजाए पारिस्थितिकी दार्शनिकता की है। पारिस्थितिकी एक सीमित विज्ञान है जिसमें वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। दर्शनशास्त्र मूलभूत वर्णनात्मक तथा निदेशात्मक परिचर्या का सर्वोत्तम सामान्य मंच है तथा राजनैतिक दर्शन इसका उप अनुभाग है। पारिस्थितिकी दार्शनिकता का अर्थ है पारिस्थितिकी सामंजस्य या समानता, तत्त्वज्ञान के रूप में दर्शनशास्त्र मुक्तरूप में मानकीय है। इसमें मानदंडों, नियमों, अभिगृहितों, मुख्य प्राथमिकता, उद्घोषणाओं तथा विश्वव्यापी कार्यों के स्तर संबंधी प्रायः प्राक्कल्पना दोनों का समावेश है। पारिस्थितिकी दर्शनशास्त्र अरस्तू या स्पिनोजा द्वारा निर्मित एक प्रकार की प्रणाली है। पारिस्थितिकीवाद के नाम पर सघन आंदोलन में विभिन्न परिवर्तनों का समर्थन किया गया है, विशेषकर प्रदूषण और संसाधनों के क्षरण पर एकतरफा दबाव दिया गया है।
सघन पारिस्थितिकी आंदोलन निम्नलिखित में से किसके द्वारा आरक्षित है?
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