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भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में मिशनरी विद्यालयों द्वारा निभाई गई भूमिका में जाने से पहले उसे वृहत्तर संदर्भ को समझना आवश्यक है जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप में सत्रहवीं शताब्दी (1700s) से ही ईसाई प्रचारक धार्मिक कार्यकर्त्ता रहे थे। ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में ब्रिटिश ताज के अधीन ब्रिटिश शक्ति के उभार के साथ, विभिन्न शाखाओं के प्रचारकों ने भारत को अपने क्रियाकलापों का एक सर्वाधिक बड़ा क्षेत्र बना लिया था।

यह 1813 में कंपनी के चार्टर में हुए संशोधन के बाद की अवधि के लिए विशेष रूप से सत्य था जिसने ईसाई प्रचारकों को कंपनी के अधिकार क्षेत्र में निर्बाध पहुँच की अनुमति दी। परन्तु शिक्षा के नए रूपों में ईसाई प्रचारकों की भागीदारी से उन्होंने महत्वपूर्ण और संभवतया सर्वाधिक दीर्घकालिक प्रभाव डाला। अनेक 'शैक्षिक मिशनरियों' ने आरंभ में पश्चिमी अधिगम और ज्ञान को ईसाई धर्म के प्रचार के साधन के रूप में देखा।

तथापि 1870 के दशक तक भारत के ब्राह्मणों व अन्य उच्च जातियों के रूपांतरण का यह दृष्टिकोण मुख्यतया अननुकूल हो गया था। तब तक सर्वाधिक सक्रिय एंग्लिकन मिशनरी सोसायटियां, चर्च मिशनरी सोसायटी (CMS), द लंदन मिशनरी सोसायटी (LMS), द सोसायटी फॉर द प्रोपेगेशन ऑफ द गास्पेल (SPG) और कैंब्रिज मिशन टू दिल्ली (CMD), अधिकांश उत्तर भारत के हाई स्कूलों और महाविद्यालयों में शिक्षण में व्यस्त थीं। संयुक्त प्रांत में, भारत की सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश, ये सोसायटियां आधे से अधिक हाई स्कूल व महाविद्यालय चलाती थीं।

इसके विपरीत अमरीकी मिशनरी सोसायटियां मुख्यतया निम्न जाति समुदायों में कार्यरत थीं और शिक्षा के उच्च स्तरों में कहीं कम शामिल थीं। अतः एंग्लिकन मिशन स्कूल उन्हीं समूहों व समुदायों से अंतःक्रिया कर रहे थे जिन्होंने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन का नेतृत्व किया।

आरंभ में अनेक 'शैक्षिक प्रचारक' मिशनरी अधिगम को किस रूप में पाते थे?

Aव्यापार प्रसार का एक तरीका
Bसामुदायिक स्वास्थ्य में सुधार का एक तरीका
Cराजनीतिक नियंत्रण का एक तरीका
Dईसाई धर्म प्रसार का एक तरीका ✓ Correct
Correct answer: (D) ईसाई धर्म प्रसार का एक तरीका
Explanation

गद्यांश कहता है कि शैक्षिक प्रचारकों ने आरंभ में पश्चिमी अधिगम और ज्ञान को ईसाई धर्म के प्रसार का साधन माना। अतः वे इसे ईसाई धर्म प्रसार का एक तरीका मानते थे।

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