भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन औपनिवेशिक आर्थिक प्रभुत्व और शोषण की प्रकृति व चरित्र की समझ में सबसे दृढ़ता और गहराई से निहित था। 1870-1905 के दौरान ब्रिटिश शासन का आर्थिक विश्लेषण करने वाले तीन नाम प्रमुख हैं, अर्थात् भारत के महान वृद्ध दादाभाई नौरोजी, न्यायमूर्ति एम.जी. रानडे, और एक सेवानिवृत्त सिविल सेवक रोमेश चंद्र दत्त। इन तीन नेताओं ने, जी.वी. जोशी, जी.के. गोखले, जी. सुब्रमण्य अय्यर, पृथ्वीश चंद्र राय और अनेक अन्य के साथ, ब्रिटिश शासन की प्रकृति और प्रयोजन पर मूलभूत प्रश्न उठाए। उनके लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सार भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के अधीन करने में था। वे यह देख सके कि उपनिवेशवाद अब लूट, कर और वणिकवाद के क्रूर उपकरणों से नहीं, बल्कि मुक्त व्यापार और विदेशी पूँजी निवेश के प्रच्छन्न और जटिल तंत्र से कार्य करता था, भारत को महानगर हेतु खाद्य और कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बनाकर और भारत को महानगरीय निर्माताओं का बाज़ार बनाकर। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय पूँजी को प्रोत्साहित करने के बजाय विदेशी पूँजी ने उसे प्रतिस्थापित और दबाया, जिससे भारत से पूँजी का अपवाह हुआ और भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश पकड़ और मज़बूत हुई।
भारतीय राष्ट्रवादियों में से किसने अंग्रेज़ों की मुक्त व्यापार नीति का विरोध किया?
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