निर्धनता के विरुद्ध संघर्ष पहले जनसंख्या समस्या से जुड़ा हुआ था। जनसंख्या संबंधी कथन तथा दृष्टिकोण बढ़ने लगे। अनेक उदाहरणों में अनुभववाद का एक कच्चा रूप अपनाया गया। इसने माल्थसवादी विचारों तथा नुस्खों को अनिवार्य बना दिया।
यह तब हुआ जबकि विशेषज्ञ विकास पर जनसांख्यिकीय कारकों के प्रभाव को संकल्पित करने का गंभीर प्रयास कर रहे थे; विभिन्न चरों को परस्पर जोड़ने तथा नीति एवं कार्यक्रम निर्माण का आधार प्रदान करने हेतु मॉडल तथा सिद्धांत बनाए गए। जैसा पश्चिम के अनुभव ने सुझाया, यह आशा थी कि देशों के विकसित होने पर जनसंख्या वृद्धि दर घटने लगेगी। किंतु, जैसा अनेकों ने चेताया, देश इस प्रक्रिया के घटित होने की प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। उन्हें अधिक प्रत्यक्ष साधनों से जनसंख्या वृद्धि में कमी को तेज करना चाहिए।
निश्चय ही, जनसंख्या को लेकर यह व्यस्तता कई दशकों से थी, विशेषकर एशिया के संदर्भ में। यह नस्ल तथा नस्लवाद की चर्चा का एक केंद्रीय विषय था। किंतु चर्चा का जो पैमाना तथा स्वरूप था, वह नया था।
शैक्षणिक हलकों में या नवजात अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के दायरे में हुई चर्चा का स्वर भी नया था। वे आर्थिक विकास तथा जनसंख्या नियंत्रण के संबंध जैसे विषयों पर केंद्रित थे। उन्होंने धनी देशों के जनसांख्यिकीय अनुभव तथा निर्धन राष्ट्रों पर उसके संभावित प्रभाव जैसे विषयों पर भी चर्चा की। अब आवश्यकता जनसंख्या के एक नए दृष्टिकोण की है, जिसमें उसके प्रबंधन हेतु नए वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीय उपकरण हों।
जनसांख्यिकी के विभिन्न चरों से संबंधित मॉडल किसका आधार बने?
गद्यांश के अनुसार ये मॉडल तथा सिद्धांत नीति एवं कार्यक्रम निर्माण का आधार प्रदान करने हेतु बनाए गए थे। अतः विकल्प D।
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