सामाजिक परिवर्तन और विकास के सिद्धांत पर मिर्डाल का सुविख्यात मत चक्रीय कारणता और संचयी परिवर्तन का है। वे विकास की सार्वभौमिक विकासात्मक अवस्थाओं के निर्माण की वैधता पर संदेह करते हैं। उनके अनुसार ये प्रायः प्रयोजनमूलक होती हैं और अक्सर उनमें रूढ़िवादी विचारधाराएँ अंतर्निहित रहती हैं।
विकास का निर्णायक कारक समग्र सामाजिक व्यवस्था का, अपनी सभी घटक दशाओं सहित, ऊर्ध्वगामी संचलन है। दक्षिण एशियाई देशों के लिए मिर्डाल द्वारा वर्णित ये दशाएँ हैं: उत्पादन और आय, उत्पादन की दशाएँ, जीवन-स्तर, जीवन और कार्य के प्रति अभिवृत्तियाँ, संस्थाएँ, और नीतियाँ। वे इन दशाओं के बीच कारणात्मक संबंध मानते हैं, जिससे किसी एक में ऊर्ध्व या अधोगामी संचलन दूसरों में भी समान प्रकृति का संचयी संचलन उत्पन्न करेगा।
मिर्डाल के अनुसार भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज़ी से एक चरम की ओर बढ़ रही है, और उनके लिए विवेकपूर्ण चयन का समय सीमित है। क्रमिकतावादी उपागम का अवसर भी समाप्त हो चुका है। मिर्डाल मानते हैं कि छोटा परिवर्तन धीरे-धीरे लाने की तुलना में बड़ा परिवर्तन तेज़ी से लाना अधिक कठिन नहीं, बल्कि आसान है। ऐसे बड़े, तीव्र परिवर्तनों के प्रमुख क्षेत्र भारतीय समाज की सामाजिक और संस्थागत दशाएँ हैं, क्योंकि वही विकास की अन्य सभी दशाओं की गतिशीलता की कुंजी रखती हैं।
मिर्डाल का सामाजिक परिवर्तन और विकास का सिद्धांत किस पर आधारित है?
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