समाजवाद का लक्ष्य, उत्पादन के साधनों पर राजकीय स्वामित्व और नियन्त्रण के माध्यम से, समानता और सामाजिक न्याय प्राप्त करना है। अभी तक, कोई भी समाजवादी देश इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाया है। यहाँ तक कि समाजवाद के प्रणेता रूस में भी काफी अन्याय, उत्पीड़न और असमानता बनी हुई है।
अभिजातों और जनता के बीच में सुस्पष्ट विषमतायें हैं। इसके विपरीत पूंजीवादी व्यवस्था निजी सम्पत्ति और स्वैच्छिक विनियम पर आधारित है। लोग इसको इस धारणा के आधार पर नापसन्द करते हैं कि यह केवल संकीर्ण और निहित स्वार्थों की सेवा करता है।
फिर भी, पूंजीवादी देशों ने बेहतर परिणाम दिखाए हैं क्योंकि वहाँ लोग तुलनात्मक रूप से कम अन्याय और असमानता तथा अधिक स्वतंत्रता और समृद्धि का आनन्द उठाते हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि समाजवाद या साम्यवाद दुष्ट और अक्षम शासकों द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया या कि पूंजीवाद में अनैतिक मूल्यों की व्याप्तता के बावजूद पूंजीवाद सफल रहा है। कोई भी राजनैतिक व्यवस्था तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि उसकी अच्छाई और नैतिक गुणों को टिकाऊ न बनाया जाय।
फिर भी कोई व्यवस्था कितनी भी आदर्शवादी क्यों न हो, उसे केवल हर व्यक्ति के अधिकारों, मूल्यों, गरिमा और निजता के प्रति सम्मान सुनिश्चित करने के द्वारा, और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आश्वासन के द्वारा ही मान्य बनाया जा सकता है। बाध्यता और बल के प्रयोग, या मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के स्थान पर सौम्यता के साथ प्रेरित करना, तर्क और विश्वास उत्पन्न करने का काम होना चाहिए। समाज में अन्तर-वैयक्तिक मानव सम्बन्धों में यह आधारभूत मूल्य है।
कोई भी समाजवादी देश इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाया क्योंकि :
गद्यांश इस विचार को अस्वीकार करता है कि समाजवाद इसलिए विफल हुआ कि दुष्ट या अक्षम शासकों ने उसे भ्रष्ट किया। वह कहता है कि कोई व्यवस्था तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसकी अच्छाई और नैतिक गुण टिकाऊ न बनें, इसलिए असली कारण यह है कि वे गुण टिकाऊ नहीं बने। अतः विकल्प D सही है।
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