यूरोपीय उपन्यास के विकास में पूँजीवादी अर्थतन्त्र और मध्यवर्ग का योगदान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है और अक्सर इस अवधारणा को हिन्दी उपन्यास के इतिहास पर भी चस्पा कर दिया जाता है।
पर हिन्दी क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए हिन्दी उपन्यास के सम्बन्ध में इस सामान्यीकरण को संगत नहीं माना जा सकता। सन अठारह सौ सत्तर से नब्बे की अवधि में हिन्दी क्षेत्र में न तो पूँजीवादी अर्थतन्त्र का कोई वर्चस्व था, न ही कोई मजबूत मध्य वर्ग पैदा हुआ था।
उस समय भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल में तड़फड़ा रहा था और एक विदेशी पूँजीवादी उसका चौतरफा शोषण कर रहा था। इस विदेशी पूँजीवाद की भाषा अंग्रेजी थी। इस व्यवस्था के पोषक के रूप में अंग्रेजी पढ़ा लिखा मध्य वर्ग वजूद में आ रहा था, पर वह अधिकतर अहिन्दी भाषी और विशेष रूप से बँगला भाषी था।
दरअसल हिन्दी उपन्यास हिन्दी भाषी जनता की राष्ट्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति था। यह भारतीय परम्परा और जातीय चेतना से जुड़ा हुआ था, न कि केवल पूँजीवादी अर्थतन्त्र की देन।
अवतरण के अनुसार उस समय भारत किसके चंगुल में तड़फड़ा रहा था?
Want more like this? Create a free account to practise a full test, track your progress, and get spaced-repetition review.
Practise on Mcqkart →🎓 Book an expert →