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'सिंदूर की होली' नाटक में मनोरमा के कथन हैं:

1.मैं तुम्हें अपना दूल्हा तो नहीं बना सकती लेकिन प्रेमी बना लूंगी।
2.तुम जानती हो मैं किसे प्रेम करती हूँ, प्रेम दो-चार से तो नहीं हो सकता और फिर अब प्रथम दर्शन में प्रेम का समय भी नहीं रहा।
3.कला की भावना किसके भीतर नहीं होती? शिक्षा और कला का सम्बन्ध कुछ नहीं है। कला का आधार तो है विश्वास और शिक्षा का संदेह।
4.पुरुष का सबसे बड़ा रोग स्त्री है और स्त्री का सबसे बड़ा रोग है पुरुष।
5.तुम कहते हो कि तुम जीवन भर अविवाहित रहोगे। इतना ही नहीं कितनी अनर्गल बातें तुम कह जाते हो। दस वर्ष का समय बीत गया। मेरा व्यवहार तुम्हारे साथ कैसा रहा, तुम स्वयं जानते हो।
Aकेवल 1, 2, 4
Bकेवल 2, 4, 5
Cकेवल 2, 3, 4
Dकेवल 1, 3, 4
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