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भारतीय संगठनों ने परंपरागत रूप से अपने मानव संसाधन को एक विशिष्ट प्रतिस्पर्धी लाभ का साधन नहीं माना है। बल्कि, भारतीय व्यवसाय प्रमुख के लिए जन-प्रबंधन एक बड़ी चुनौती रहा है। आज यह स्थिति तेजी से बदल रही है, क्योंकि जैसे जैसे भारतीय संगठन व्यावसायिक मानव संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता को पहचान रहे हैं, साथ ही प्रशिक्षित मानव संसाधन पेशेवरों की माँग भी बढ़ रही है। अधिकांश विश्वविद्यालयों में बिजनेस स्कूलों ने मानव संसाधन पेशेवरों को प्रशिक्षित करने हेतु विशेषीकृत, अनुकूलित पाठ्यक्रम प्रदान करना आरंभ कर दिया है।

संगठन अधिकाधिक रूप से लाइन प्रबंधकों को मानव संसाधन की जिम्मेदारियाँ संभालने हेतु प्रोत्साहित कर रहे हैं। प्राचीन भारत अपनी व्यवसाय-आधारित पदानुक्रम के लिए जाना जाता था। प्राचीन भारतीय ग्रंथ अर्थशास्त्र में एक पर्यवेक्षक के कार्य-विवरण तथा कारीगरों हेतु निष्पादन-आधारित वेतन का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1850 के पश्चात ही भारत में औपचारिक औद्योगिक संगठन उभरे।

किंतु 1947 में भारत के स्वतंत्र देश बनने के पश्चात ही व्यवसाय संगठनों की कार्मिक प्रबंधन नीति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। स्वतंत्रता के पश्चात, जब भारतीय विकास मॉडल के रूप में मिश्रित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित किया गया, तो औद्योगिक संगठनों को मोटे तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र में वर्गीकृत किया गया। चूँकि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ बड़े निवेश की प्राप्तकर्ता थीं तथा सबसे बड़ी नियोक्ता बनीं, अतः कार्मिक प्रबंधन के प्रति उनके दृष्टिकोण पर बहुत ध्यान दिया गया। भारत के संविधान में निहित वैज्ञानिक समाज के लक्ष्य का तात्पर्य था कि मानव संसाधन का संरक्षण एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बन गया।

श्रमिकों की रक्षा हेतु अनेक संवैधानिक प्रावधान बनाए गए। संगठनों को सभी कार्मिकों की देखभाल हेतु कल्याण अधिकारी नियुक्त करने पड़े। विकास के अगले चरण में भारतीय व्यवसाय संगठनों में ट्रेड यूनियनों तथा प्रबंधक यूनियनों का उदय हुआ। इसने अधिकांश संगठनों में कार्मिक कार्यालयों की वृद्धि को और बढ़ावा दिया।

व्यवसाय संगठनों की कार्मिक प्रबंधन नीति में उल्लेखनीय सुधार कब देखा गया?

A1850
B1857
C1940
D1947 ✓ Correct
Correct answer: (D) 1947
Explanation

गद्यांश के अनुसार 1947 में स्वतंत्रता के पश्चात ही उल्लेखनीय सुधार देखा गया। अतः विकल्प D।

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