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वर्चस्व (hegemony) का एक अनिवार्य कार्य लोगों को ऐसी सामाजिक व्यवस्था के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए मना लेना है जो बदले में उनका समर्थन नहीं करती। हाशिए के समूह प्रायः उन विचारधाराओं के विरुद्ध विरोध या विद्रोह नहीं करते जो अत्यधिक रूप से विशेषाधिकार-प्राप्त समूहों का समर्थन करती हैं, क्योंकि किसी स्तर पर वे प्रभुत्व-अधीन रहने की सहमति दे देते हैं। इससे तुरंत यह प्रश्न उठता है: कोई ऐसी व्यवस्था के लिए सहमति क्यों देगा?

यद्यपि प्रभुत्वशाली विचारधाराएँ सामाजिक रूप से शक्तिशाली समूहों की इच्छाओं और हितों को प्रतिबिंबित कर सकती हैं, इन विचारधाराओं के वर्चस्वी बने रहने हेतु उनमें एक अतिरिक्त वादा भी होना चाहिए: इन विश्वासों को स्वीकार करना हाशिए के समूहों के भी सर्वोत्तम हित में है। शक्तिशाली समूहों के सदस्य अपने विश्व-दृष्टिकोण को सार्वभौम सोच के रूप में स्वीकृत कराने का प्रयास करते हैं, और इन समूहों के बाहर के लोग इनमें से कुछ विचारधाराओं को इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि वे किसी रूप में लाभप्रद प्रतीत होती हैं। इसे स्वतःस्फूर्त सहमति (spontaneous consent) की प्रक्रिया कहा जाता है, क्योंकि यह प्रायः अनौपचारिक या अलक्षित होती है।

उदाहरणतः किसी राष्ट्र की उच्च शिक्षा प्रणाली में एक प्रभुत्वशाली विश्वास यह सुझाता है कि कॉलेज छात्रों को अपनी शिक्षा का भुगतान स्वयं करना चाहिए। इससे प्रभावित होते हुए भी छात्र इसे स्वीकार कर लेते हैं, और विचारधारा जीवित रहती है।

किंतु जब ऐसी सहमति विफल होती है, तो वर्चस्व यह समझाता है कि प्रभुत्वशाली विचारधाराएँ लचीले अपनयन (flexible appropriation) की प्रक्रिया से इस विफलता को समाहित करने हेतु कैसे विकसित होती हैं। ऐसी स्थिति में प्रभुत्वशाली सांस्कृतिक संस्थाएँ किसी भी चुनौती देने वाले विश्वास को आत्मसात कर, उसे वर्चस्वी ढाँचे में समाहित कर, पूर्व मानदंड को पुनः स्थापित कर लेती हैं। परिणामस्वरूप वर्चस्वी प्रणालियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं; वे सामाजिक समूहों के बीच निरंतर लेन-देन द्वारा केवल अपना रूप बदल लेती हैं।

प्रभुत्वशाली विचारधारा किसके कारण जीवित रहती है?

Aसामाजिक शक्ति
Bलचीला अपनयन (flexible appropriation) ✓ Correct
Cलाभप्रद विशेषताएँ
Dवैचारिक घटक
Correct answer: (B) लचीला अपनयन (flexible appropriation)
Explanation

प्रभुत्वशाली विचारधारा लचीले अपनयन के कारण जीवित रहती है, अतः विकल्प B सही है।

जब स्वतःस्फूर्त सहमति विफल होती है, तो व्यवस्था केवल ढह नहीं जाती।

इसके बजाय प्रभुत्वशाली सांस्कृतिक संस्थाएँ चुनौती देने वाले विश्वासों को आत्मसात कर लेती हैं।

वे चुनौती को वर्चस्वी ढाँचे में समाहित कर पूर्व मानदंड को पुनः स्थापित कर देती हैं।

इस अनुकूली आत्मसातीकरण और पुनर्संरचना को लचीला अपनयन कहते हैं।

इसके कारण वर्चस्वी प्रणालियाँ कभी लुप्त नहीं होतीं, केवल रूप बदलती हैं।

अतः अस्तित्व असहमति को आत्मसात कर उदासीन करने की इसी क्षमता पर टिका है।

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