जलवायु परिवर्तन का मानव समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। आने वाली एक या दो शताब्दियों में प्रक्षेपित परिवर्तनों का स्वरूप, मान लीजिए किसी पूर्ण परमाणु युद्ध या किसी बड़े क्षुद्रग्रह के सीधे टकराव जैसा, प्रलयंकारी एवं सभ्यता को नष्ट करने वाला नहीं होगा। किंतु जलवायु परिवर्तन ऐसी सभ्यता के लिए अनेक रूपों में विघटनकारी होगा जिसका ग्रह-गृह पहले से ही अरबों मनुष्यों की माँगों से दबाव में है।
जलवायु परिवर्तन के भौतिक प्रभाव विश्व भर में समान रूप से वितरित नहीं होंगे। उदाहरणतः निचले तटीय क्षेत्र समुद्र-स्तर में वृद्धि से अधिक पीड़ित होंगे, महाद्वीपीय आंतरिक भाग अधिक सूखा देखेंगे, तथा उच्च अक्षांश असमान रूप से अधिक गर्म होंगे। केवल इसी कारण से प्रभाव देश-देश में भिन्न होंगे।
किंतु सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक कारक भी बदलती जलवायु के प्रभाव को बदल देते हैं। इसका कारण यह है कि धनी देश हानिकारक प्रभावों के प्रति अनुकूलन तथा उनका सामना करने में अधिक सक्षम हैं।
धनी देश बढ़ते समुद्रों को रोकने हेतु सुरक्षात्मक समुद्री दीवारें बना सकते हैं; ताजे जल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु विशाल जल परियोजनाएँ बना सकते हैं; घरेलू कृषि में गिरावट पर खाद्य आयात बढ़ाने हेतु निर्धन देशों से अधिक बोली लगा सकते हैं; उनकी उन्नत स्वास्थ्य सेवाएँ फैलते उष्णकटिबंधीय रोगों का बेहतर सामना कर सकती हैं; तथा उनकी सुदृढ़ अर्थव्यवस्थाएँ चरम मौसमी घटनाओं से शीघ्र उबर सकती हैं। हम इस दुर्भाग्यपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जलवायु परिवर्तन धनी तथा निर्धन राष्ट्रों के बीच की खाई को और बढ़ाएगा, क्योंकि सबसे कम संसाधनों वाले सर्वाधिक संवेदनशील होंगे। यह निष्कर्ष विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि मानवजनित जलवायु परिवर्तन लगभग पूर्णतः जीवाश्म ईंधन के उपभोग, वनोन्मूलन तथा विकसित विश्व द्वारा या उसके लाभ हेतु की गई अन्य गतिविधियों का परिणाम है।
मानव समाज पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कैसा होगा?
गद्यांश के अनुसार प्रभाव परमाणु युद्ध जैसा प्रलयंकारी नहीं होगा, किंतु अनेक रूपों में विघटनकारी होगा। अतः विकल्प C।
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