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जलवायु परिवर्तन तथा विश्व-भर में इसकी अनिवार्यताएँ अब पृथ्वी पर बढ़ते तापमान की तात्कालिक विवशताओं से आगे बढ़ चुकी हैं। यह आज राष्ट्रों के बीच भू-राजनीति तथा विकसित देशों से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर आर्थिक संतुलन में परिवर्तन पर एक बहस है। अतः वैश्विक नेताओं की बयानबाजी को सावधानी से लेना चाहिए, क्योंकि यह पूर्णतः जलवायु परिवर्तन की चिंताओं के विषय में नहीं है।

आर्थिक शक्ति के पूर्व तथा एशिया के उभरते देशों की ओर बदलते अक्ष को समझने में संभवतः कुछ समय लगेगा। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ अभी वैश्विक मंच पर छोटे-छोटे कदम रखना आरंभ ही कर रही हैं, और उद्योग एवं उद्यमिता को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

भारत में लाखों परिवारों को अपने घर रोशन करने के लिए आज भी जलावन लकड़ी एवं मिट्टी के तेल पर निर्भर रहना पड़ता है, जबकि प्रतिवर्ष अनेक भारतीय मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मर जाते हैं। ऐसे राष्ट्रों की प्राथमिकता मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति, भोजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्रदान करना है, न कि उत्सर्जन घटाने हेतु तकनीकों के आयात पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का बड़ा भाग व्यय करना। भारत को अपना योगदान देना है, किंतु अपनी शर्तों पर तथा अपनी गति से।

गद्यांश का मुख्य केंद्र-बिंदु किस पर है?

Aजलवायु परिवर्तन और इसका प्रभाव
Bजलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति
Cजलवायु परिवर्तन और विकासात्मक अनिवार्यताएँ ✓ Correct
Dजलवायु परिवर्तन और शमन रणनीतियाँ
Correct answer: (C) जलवायु परिवर्तन और विकासात्मक अनिवार्यताएँ
Explanation

मुख्य केंद्र जलवायु परिवर्तन और विकासात्मक अनिवार्यताएँ हैं, अतः यही उत्तर है।

गद्यांश जलवायु बहस को विकासशील राष्ट्रों की आवश्यकताओं से जोड़ता है।

यह बल देता है कि भारत को पहले भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी करनी चाहिए।

यह तर्क देता है कि उत्सर्जन कटौती विकास की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

अतः इसकी केंद्रीय चिंता विकासात्मक अनिवार्यताओं के साथ जलवायु परिवर्तन है।

प्रभाव, भू-राजनीति और शमन रणनीतियाँ छुई गई हैं पर मुख्य केंद्र नहीं हैं।

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