स्वतंत्रता के बाद के काल में उत्पन्न महान सांस्कृतिक पुनर्जागरण के भाग के रूप में, सृजनात्मक गतिविधि के विविध क्षेत्रों में परंपरा के साथ एक अत्यंत सार्थक भेंट हुई। परंपरा की ओर लौटना और उसकी खोज जड़ों की तलाश और पहचान की खोज से प्रेरित थी।
यह हमारी जीवन-शैली, मूल्यों, सामाजिक संस्थाओं, सृजनात्मक रूपों और सांस्कृतिक ढंगों के विऔपनिवेशीकरण (decolonization) की समूची प्रक्रिया का भाग थी। आधुनिक भारतीय रंगमंच, जो औपनिवेशिक रंग-संस्कृति का उत्पाद था, परंपरागत मार्ग से अपने प्रचंड विस्थापन की भरपाई हेतु जड़ों की तलाश की आवश्यकता सर्वाधिक तीव्रता से अनुभव करता था।
बी. वी. कारंत, के. एन. पणिक्कर और रतन थियम जैसे निर्देशकों की परंपरा से अत्यंत सार्थक भेंट हुई और अपने कार्य से उन्होंने समकालीन रंगमंच के औपनिवेशिक मार्ग को उलटकर उसे महान नाट्यशास्त्र परंपरा की पटरी पर लौटा दिया। यह विरोधाभासी लगता है, पर उनका रंगमंच पारंपरिक यथार्थवादी रंगमंच के संदर्भ में अग्रगामी (avant-garde) भी है और फिर भी नाट्यशास्त्र रंग-परंपरा से संबंधित है।
नाट्यशास्त्र परंपरा किसे संदर्भित करती है?
नाट्यशास्त्र परंपरा भारतीय रंग-परंपरा है, इसलिए उत्तर भारतीय रंग-परंपरा है।
नाट्यशास्त्र नाट्यकला पर प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है, जिसका श्रेय भरत मुनि को दिया जाता है।
यह नाटक, अभिनय, संगीत और सौंदर्यशास्त्र का शास्त्रीय भारतीय सिद्धांत निर्धारित करता है।
अतः इसकी परंपरा देशज भारतीय रंग-परंपरा है।
औपनिवेशिक परंपरा ठीक वही है जिसे निर्देशकों ने उलटा, अतः वह नाट्यशास्त्र परंपरा नहीं है।
अग्रगामी रंगमंच आधुनिक, प्रयोगात्मक पक्ष का वर्णन करता है, शास्त्रीय भारतीय जड़ का नहीं।
पारंपरिक यथार्थवादी रंगमंच वह पश्चिमी रूप है जिसके सामने उनका कार्य अग्रगामी के रूप में खड़ा है।
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