भारतीय न्यायपालिका एक एकीकृत और पदानुक्रमिक प्रणाली के रूप में कार्य करती है, जिसके शिखर पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) है, उसके बाद राज्यों में उच्च न्यायालय (High Courts) हैं। इसकी शक्ति की आधारशिला न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) है, अर्थात् केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के विधायी अधिनियमों और कार्यपालिका आदेशों की संवैधानिकता की जाँच का अधिकार। यदि वे संविधान का उल्लंघन करते पाए जाते हैं, तो उन्हें शून्य और अकृत घोषित किया जा सकता है। हाल के दशकों में, न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) की परिघटना के माध्यम से न्यायपालिका की भूमिका विस्तृत हुई है। यह नागरिकों, विशेषकर वंचितों, के अधिकारों की रक्षा और प्रवर्तन हेतु न्यायालयों के एक अग्रसक्रिय दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो प्रायः कार्यपालिका या विधायिका के लिए परंपरागत रूप से आरक्षित क्षेत्रों में हस्तक्षेप करके होता है। इस सक्रियता का एक प्रमुख साधन जनहित याचिका (Public Interest Litigation, PIL) रहा है, जो किसी भी नागरिक को उन लोगों की ओर से न्यायालय जाने की अनुमति देता है जो स्वयं नहीं जा सकते। किंतु न्यायिक शक्ति के इस विस्तार ने न्यायिक अतिक्रमण और न्यायिक सुधार (Judicial Reform) की आवश्यकता पर एक बहस को जन्म दिया है। सुधार पर विमर्श न्यायिक जवाबदेही बढ़ाने, नियुक्तियों और कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने, और आम नागरिक के लिए न्याय को अधिक सुलभ और कुशल बनाने हेतु लंबित मामलों के विशाल ढेर से निपटने पर केंद्रित है।
'न्यायिक सुधार' पर चल रहा विमर्श मुख्यतः निम्नलिखित में से किस मुद्दे को संबोधित करता है?
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