भविष्य का समाज, भाषायी तत्वों की अर्थक्रिया की तुलना में न्यूटनीय मानवशास्त्र की परिधि में कम आता है। भाषायी खेल अनेक हैं, तत्वों की एक विविधता। इनसे संस्थाओं का उद्भव टुकड़ों-टुकड़ों में ही हो सकता है, एक प्रकार का स्थानिक नियतिवाद।
हालाँकि, नीति निर्धारक, इस तर्क के आधार पर कि घटक परस्पर अनुरूप हैं और समग्र का निर्धारण किया जा सकता है, समाज के इन घटकों का प्रबंधन इनपुट-आउटपुट मैट्रिक्स के अनुरूप करते हैं। वे हमारा जीवन शक्ति के संवर्धन में नियत कर देते हैं। सामाजिक न्याय एवं वैज्ञानिक सत्य दोनों संदर्भों में शक्ति की वैधानिकता उसके द्वारा तंत्र की निष्पादन क्षमता की अभिवृद्धि पर आधारित है।
इस निकष का हमारे प्रत्येक खेल में प्रयोग एक भयानक दृश्य उत्पन्न करता है, चाहे सरल या कठिन रूप में: ‘चलते रहो या नष्ट हो जाओ’। निष्पादनात्मकता का निकष तकनीकी निकष है, क्या सत्य है अथवा क्या न्यायपूर्ण है इसका निर्णय करने में इस निकष की कोई प्रासंगिकता नहीं है।
क्या वैधानिकता चर्चा के माध्यम से प्राप्त होने वाली सर्वसम्मति में पायी जा सकती है? यह सर्वसम्मति भाषायी खेलों की विविधता के प्रति हिंसा करती है तथा आविष्कार का उद्भव सदैव वैमत्य से होता है।
यह गद्यांश से यह सलाह देता हुआ प्रतीत होता है कि न्यूटनीय मानवशास्त्र यह नहीं है:
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