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यद्यपि भिन्न-भिन्न लोग मेज को थोड़ा-थोड़ा भिन्न प्रकार से देखते हैं, तथापि वे भी जब मेज की तरफ देखते हैं, तो न्यूनाधिक रूप में एक जैसी वस्तु देखते हैं, और उनके देखने में होनेवाली भिन्नताओं को प्रकाश के परिप्रेक्ष्य और परावर्तन के नियमों के द्वारा समझाया जा सकता है ताकि विभिन्न लोगों के इंद्रिय प्रदत्त कथनों में निहित स्थायी वस्तु तक पहुंचा जा सके।

अतः यह सच है कि विभिन्न लोगों के विभिन्न इंद्रिय प्रदत्त होते हैं तथा यह भी सच है कि विभिन्न समय में दिए गए किसी एक स्थान पर एक व्यक्ति का एक ही इन्द्रिय प्रदत्त होता है जिससे हम यह जान लेते हैं कि उपर्युक्त इंद्रिय प्रदत्त कथनों के अतिरिक्त एक स्थाई सार्वजनिक वस्तु है जिसे विभिन्न समय में विभिन्न लोगों के इंद्रिय-दत्त कथनों द्वारा देखा जाना माना जाता है।

अब जहां एक उपर्युक्त विचार यह माने जाने पर निर्भर करते हैं कि हमारे अतिरिक्त अन्य लोग हैं जो इस प्रश्न को उठाएंगे। अन्य लोग अपनी बातें कतिपय इंद्रिय-प्रदत्त कथनों यथा उनकी दृष्टि अथवा उनकी आवाज के द्वारा बताएंगे यदि मुझे यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि मेरे इन्द्रिय-प्रदत्त से स्वतंत्र भी भौतिक वस्तुएं हैं। यह विश्वास करने का भी कारण नहीं है कि अन्य लोग मेरे सपने के भाग के अतिरिक्त भी अस्तित्ववान हैं। इस प्रकार जब हम यह बताने के प्रयास करते हैं कि हमारे इन्द्रिय-प्रदत्त कथन से स्वतंत्र भी वस्तुएं अवश्य होंगी, तो हम अन्य व्यक्तियों के साक्ष्य को उद्घृत नहीं कर सकते हैं क्योंकि साक्ष्य में ही इन्द्रिय-दत्त कथन हैं।

'जगत में हमारे अतिरिक्त अन्य लोग हैं' इस स्थिति की विरोधी दार्शनिक स्थिति है :

Aअहंमात्रवाद
Bव्यक्तिनिष्ठ प्रत्ययवाद
Cअतीन्द्रिय प्रत्ययवाद
Dसंशयवाद
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