चिंतनशील मूल्यांकन सापेक्ष महत्व के संबंध में तर्क की माँग करता है, केवल गिनती की नहीं। यह एक ऐसी क्रिया है जिसमें हम निरंतर लगे रहते हैं।
उस सामान्य समझ में सार्वजनिक तर्क के संभावित महत्व को जोड़ना होगा, जो मूल्यांकनों की पहुँच एवं विश्वसनीयता बढ़ाने तथा उन्हें अधिक सुदृढ़ बनाने का एक तरीका है। संवीक्षा तथा आलोचनात्मक आकलन की आवश्यकता केवल एकाकी व्यक्तियों द्वारा आत्मकेंद्रित मूल्यांकन की माँग नहीं है, अपितु सार्वजनिक चर्चा तथा अंतःक्रियात्मक सार्वजनिक तर्क की उपयोगिता का संकेत है: यदि सामाजिक मूल्यांकन पूर्णतः पृथक तथा एकांत बोध पर आधारित हों, तो वे उपयोगी सूचना एवं अच्छे तर्कों से वंचित रह सकते हैं। सार्वजनिक चर्चा तथा विचार विमर्श विशेष प्रकार्यों एवं उनके संयोजनों की भूमिका, पहुँच तथा महत्व की बेहतर समझ की ओर ले जा सकते हैं।
उदाहरणार्थ, भारत में लैंगिक असमानताओं की सार्वजनिक चर्चा ने हाल के वर्षों में उन कतिपय स्वतंत्रताओं के महत्व को उजागर किया है जिन्हें पहले पर्याप्त मान्यता नहीं मिली थी। इनमें वे स्वतंत्रताएँ सम्मिलित हैं जो महिलाओं को उन निश्चित एवं परंपरागत पारिवारिक भूमिकाओं से हटने की हैं जो उनके सामाजिक एवं आर्थिक अवसरों को सीमित करती हैं, तथा ऐसी सामाजिक मूल्य प्रणाली से भी जो महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों के अभाव को पहचानने की ओर अधिक उन्मुख है। सुस्थापित, पुरुष प्रधान समाजों में लैंगिक असमानता के ये परंपरागत पूर्ववृत्त केवल व्यक्तिगत चिंता ही नहीं, अपितु सूचनात्मक सार्वजनिक चर्चा तथा प्रायः आंदोलन की भी माँग करते हैं।
सामाजिक आकलन में सार्वजनिक तर्क तथा क्षमताओं के चयन एवं भारण के बीच के संबंध पर बल देना महत्वपूर्ण है। यह उस तर्क की निरर्थकता की ओर भी संकेत करता है जो कभी कभी प्रस्तुत किया जाता है कि क्षमता उपागम तभी प्रयोज्य एवं प्रचालनीय होगा जब वह प्रासंगिक क्षमताओं की किसी निश्चित सूची में अलग अलग प्रकार्यों पर दिए गए भारों के समुच्चय के साथ आए।
लैंगिक असमानताओं पर सार्वजनिक चर्चा हमें किसका समर्थन करने को प्रेरित करती है?
गद्यांश के अनुसार चर्चा निश्चित पारिवारिक भूमिकाओं तथा पुरुष उन्मुख मूल्य प्रणाली से हटने की स्वतंत्रता को उजागर करती है, अर्थात वर्तमान मूल्य प्रणाली में सुधार। अतः विकल्प D।
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