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स्वतंत्रता के बाद के काल में उत्पन्न महान सांस्कृतिक पुनर्जागरण के भाग के रूप में, सृजनात्मक गतिविधि के विविध क्षेत्रों में परंपरा के साथ एक अत्यंत सार्थक भेंट हुई। परंपरा की ओर लौटना और उसकी खोज जड़ों की तलाश और पहचान की खोज से प्रेरित थी।

यह हमारी जीवन-शैली, मूल्यों, सामाजिक संस्थाओं, सृजनात्मक रूपों और सांस्कृतिक ढंगों के विऔपनिवेशीकरण (decolonization) की समूची प्रक्रिया का भाग थी। आधुनिक भारतीय रंगमंच, जो औपनिवेशिक रंग-संस्कृति का उत्पाद था, परंपरागत मार्ग से अपने प्रचंड विस्थापन की भरपाई हेतु जड़ों की तलाश की आवश्यकता सर्वाधिक तीव्रता से अनुभव करता था।

बी. वी. कारंत, के. एन. पणिक्कर और रतन थियम जैसे निर्देशकों की परंपरा से अत्यंत सार्थक भेंट हुई और अपने कार्य से उन्होंने समकालीन रंगमंच के औपनिवेशिक मार्ग को उलटकर उसे महान नाट्यशास्त्र परंपरा की पटरी पर लौटा दिया। यह विरोधाभासी लगता है, पर उनका रंगमंच पारंपरिक यथार्थवादी रंगमंच के संदर्भ में अग्रगामी (avant-garde) भी है और फिर भी नाट्यशास्त्र रंग-परंपरा से संबंधित है।

स्वतंत्रता के बाद के युग में परंपरा की ओर लौटना और उसकी खोज किससे प्रेरित थी?

1.मूल्यों की तलाश
2.जड़ों की तलाश
3.यथार्थवाद की तलाश
4.पहचान की तलाश
Aकेवल 1 और 2
Bकेवल 4 और 3
Cकेवल 2, 3 और 4
Dकेवल 2 और 4 ✓ Correct
Correct answer: (D) केवल 2 और 4
Explanation

परंपरा की ओर लौटना जड़ों और पहचान की तलाश से प्रेरित था, इसलिए उत्तर 2 और 4 है।

अनुच्छेद कहता है कि परंपरा की ओर लौटना जड़ों की तलाश से प्रेरित था।

यह जोड़ता है कि यह पहचान की खोज भी थी।

अतः मद 2 और 4 अनुच्छेद से सीधे मेल खाते हैं।

मद 1 की मूल्यों की तलाश परंपरा की ओर लौटने की प्रेरणा के रूप में नामित नहीं है।

मद 3 की यथार्थवाद की तलाश अनुच्छेद में किसी उद्देश्य के रूप में उल्लिखित ही नहीं है।

अनुच्छेद प्रश्नों में केवल उन्हीं कारणों को लेना चाहिए जिन्हें पाठ वास्तव में बताता है।

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