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एक अर्थ में यह स्वीकार करना ही होगा कि हम स्वयं और अपने अनुभवों के अतिरिक्त किसी वस्तु के अस्तित्व को कभी सिद्ध नहीं कर सकते। इस परिकल्पना से कोई तार्किक असंगति नहीं निकलती कि जगत् केवल मुझसे और मेरे विचारों, भावों तथा संवेदनाओं से बना है और शेष सब कुछ मात्र कल्पना है। स्वप्न में एक अत्यंत जटिल संसार उपस्थित प्रतीत हो सकता है, फिर भी जागने पर हम पाते हैं कि वह एक भ्रम था; अर्थात् स्वप्न के इंद्रिय-दत्त (sense-data) उन भौतिक वस्तुओं से मेल नहीं खाते जिनका हम स्वाभाविक रूप से अपने इंद्रिय-दत्त से अनुमान करते।

यह सत्य है कि जब भौतिक जगत् मान लिया जाता है, तो स्वप्न के इंद्रिय-दत्त के भौतिक कारण खोजे जा सकते हैं: उदाहरण के लिए, एक दरवाज़े के खटखटाने से हमें नौसैनिक युद्ध का स्वप्न आ सकता है। किंतु यद्यपि इस स्थिति में इंद्रिय-दत्त का एक भौतिक कारण है, फिर भी उस रूप में इंद्रिय-दत्त के अनुरूप कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिस रूप में एक वास्तविक नौसैनिक युद्ध अनुरूप होता।

इस परिकल्पना में कोई तार्किक असंभवता नहीं है कि समस्त जीवन ही एक स्वप्न है, जिसमें हम स्वयं अपने सामने आने वाली सभी वस्तुओं का सृजन करते हैं। किंतु यद्यपि यह तार्किक रूप से असंभव नहीं है, फिर भी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यह सत्य है। वस्तुतः अपने जीवन के तथ्यों की व्याख्या के साधन के रूप में देखा जाए तो यह उस सामान्य-बोध परिकल्पना से कम सरल है कि ऐसी वस्तुएँ सचमुच हैं जो हमसे स्वतंत्र हैं, जिनकी क्रिया हमारी संवेदनाओं का कारण बनती है।

यह कथन कि "इंद्रिय-दत्त के भौतिक कारण होते हैं" निम्नलिखित में से किन दार्शनिक विचारों के अनुरूप है?

1.सहज यथार्थवाद (Naive Realism)
2.प्रतिनिधानात्मक यथार्थवाद (Representative Realism)
3.प्रत्ययवाद (Idealism)
4.अहंमात्रवाद (Solipsism)
A1 and 2 only
B1 and 3 only
C2 and 4 only
D3 and 4 only
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