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आरंभिक मध्यकाल के राजनीतिक इतिहास में राज्यों और भू-अनुदानों का प्रसार हुआ। ब्राह्मणों को भू-अनुदानों ने राजनीतिक सत्ता के वैधीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कृषि-संबंधों पर गहरा प्रभाव डाला। उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में कृषि-विस्तार हुआ और ग्रामीण समाज उत्तरोत्तर स्तरीकृत होते गए। यह नगरीय ह्रास का काल नहीं था। यह दक्षिण भारत से सर्वाधिक स्पष्ट है, जहाँ शिल्प, नगर, व्यापार और व्यापार-श्रेणियाँ फलीं-फूलीं। उपमहाद्वीप, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच व्यापारिक संबंध उल्लेखनीय रूप से बढ़े। भक्ति-पूजा धार्मिक चिंतन और व्यवहार की एक चिह्नित विशेषता थी। मंदिर केवल पवित्र स्थल ही नहीं, बल्कि नगरीय केंद्रों के मूल और राजनीतिक प्रतीक भी थे। उन्हें मिले संरक्षण ने उन्हें विविध सामाजिक समूहों की गतिविधियों और आकांक्षाओं के संगम-बिंदु बना दिया। सांस्कृतिक क्षेत्र में संस्कृत और देशी भाषाओं में अनेक ग्रंथों सहित महत्वपूर्ण विकास हुआ। मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला का उत्कर्ष और परिष्कार हुआ, और भिन्न क्षेत्रीय शैलियाँ स्पष्ट हुईं। लगभग 600-1200 ई. के दौरान राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तरों पर हुए विकास भिन्न क्षेत्रीय रूपों और प्रतिमानों में स्फटिकित हुए।

यहाँ संदर्भित 'आरंभिक मध्यकाल' शब्द लगभग कब आरंभ हुआ बताया गया है?

A1206 ई.
B12वीं शताब्दी
C11वीं शताब्दी
D600 ई.
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