आधुनिक राष्ट्र-राज्य, विशेषकर कल्याणकारी राज्य (welfare state) के अपने रूप में, वैश्वीकरण (globalization) की शक्तियों से गहराई से चुनौती पाता रहा है। कल्याणकारी राज्य की विशेषता सरकार की इस प्रतिबद्धता में है कि वह अपने नागरिकों के लिए न्यूनतम जीवन-स्तर सुनिश्चित करे, तथा सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवा, बेरोज़गारी भत्ते और पेंशन जैसी सेवाएँ प्रदान करे। यह प्रतिमान, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के युग में फला-फूला, राज्य की कर लगाने, अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को विनियमित करने और अपनी संप्रभु सीमाओं के भीतर सामाजिक नीतियाँ लागू करने की क्षमता पर बहुत अधिक निर्भर है। किंतु वैश्वीकरण, जिसे सीमाओं के पार पूँजी, माल और सूचना की बढ़ी हुई गतिशीलता से परिभाषित किया जाता है, ने राष्ट्र-राज्यों की स्वायत्तता को उल्लेखनीय रूप से सीमित कर दिया है। बहुराष्ट्रीय निगमों (multinational corporations) की उत्पादन को कम मज़दूरी और कर वाले देशों में स्थानांतरित करने की क्षमता एक तलहटी की दौड़ (race to the bottom) उत्पन्न करती है, जो सरकारों पर प्रतिस्पर्धी बने रहने हेतु निगम कर दरें घटाने और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विनियमन-मुक्त करने का दबाव डालती है। इससे, बदले में, व्यापक कल्याण कार्यक्रमों के वित्तपोषण हेतु आवश्यक कर-आधार क्षीण हो सकता है। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का बढ़ता प्रभाव और वैश्विक व्यापार व्यवस्थाओं का पालन प्रायः राष्ट्रों से नवउदारवादी (neoliberal) नीतियाँ अपनाने की अपेक्षा करता है जो सामाजिक कल्याण के प्रावधान पर वित्तीय अनुशासन और मुक्त बाज़ारों को प्राथमिकता देती हैं। परिणामस्वरूप, यह बहस जारी है कि क्या वैश्वीकरण कल्याणकारी राज्य के पीछे हटने और अंततः पतन की ओर ले जा रहा है, या फिर उसके एक अधिक सुव्यवस्थित, प्रतिस्पर्धा राज्य (competition state) में रूपांतरण की ओर, जो व्यापक सामाजिक संरक्षण के बजाय राष्ट्रीय आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर केंद्रित हो।
अनुच्छेद के संदर्भ में 'तलहटी की दौड़' पद किसे संदर्भित करता है?
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