संयुक्त राष्ट्र (United Nations) अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रमुख वैश्विक संस्था के रूप में खड़ा है, जिसके मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने, तथा सामाजिक प्रगति, बेहतर जीवन-स्तर और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं। इसकी संरचना कई प्रमुख अंगों पर आधारित है, जिनमें महासभा (General Assembly), सुरक्षा परिषद (Security Council), आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC), और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) सम्मिलित हैं। संयुक्त राष्ट्र के कार्य का मूल्यांकन एक जटिल और प्रायः विवादित रिकॉर्ड प्रकट करता है। अपने शांति और विकास दृष्टिकोणों में यह संगठन सुरक्षा को आर्थिक और सामाजिक कल्याण से जोड़ने का प्रयास करता है, यह मानते हुए कि निर्धनता और अन्याय के बीच स्थायी शांति नहीं बनाई जा सकती। किंतु इसकी प्रभावशीलता, विशेषकर शांति और सुरक्षा मामलों में, प्रायः इसके शक्तिशाली सदस्य-राज्यों के राजनीतिक हितों से बाधित होती है, विशेषकर सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति (veto power) से। संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू मानवीय हस्तक्षेप (humanitarian intervention) की अवधारणा रही है। यह राज्यों द्वारा, कभी-कभी संयुक्त राष्ट्र के प्राधिकार से, की जाने वाली दबावकारी कार्रवाई को दर्शाता है, जिसमें किसी अन्य राज्य में उसकी अनुमति के बिना बड़े पैमाने के मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने हेतु सैन्य बल का प्रयोग सम्मिलित होता है। यह प्रथा राज्य-संप्रभुता के पारंपरिक सिद्धांत को सीधे चुनौती देती है और अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत इसकी वैधता और औचित्य पर बहस को बल देती है, जो नियमों का एक ऐसा निकाय है जिसका न्यायनिर्णयन आंशिक रूप से अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court) जैसे संयुक्त राष्ट्र-संबद्ध निकायों द्वारा भी होता है।
संयुक्त राष्ट्र के 'शांति और विकास दृष्टिकोण' किस मान्यता पर आधारित हैं?
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