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शैक्षिक चर्चाओं में नारों और आकर्षक शब्दों का औपचारिक प्रयोग विचार और कर्म के बीच एक क्षीण संबंध का संदेह जगाता है। जैसे-जैसे रटे-रटाए वाक्यांश बढ़ते हैं और बातचीत एक आदर्शवादी झंकार लेने लगती है, सतर्क श्रोता यह सोचने लगे कि इन अवधारणाओं को दिया गया ज़ुबानी सम्मान कक्षाओं में वास्तव में जो होता है उससे जुड़ा है या नहीं।

आज के युग में शिक्षा में लोकतंत्र, सृजनात्मकता और नवाचार का विरोध करना कठिन है, किंतु ये आकर्षक शब्द शिक्षण-अभ्यास के अधिक सामान्य कार्य से कैसे जुड़ते हैं? उत्तर, निस्संदेह, यह है कि दोनों प्रायः जुड़े नहीं होते, एक ऐसा तथ्य जो आज के शिक्षाविदों की सबसे बार-बार दोहराई जाने वाली शिकायतों में से एक की व्याख्या करता है, अर्थात् एक ओर सिद्धांत, यानी शैक्षिक बातचीत, और दूसरी ओर व्यवहार के बीच का अत्यंत स्पष्ट अंतर। शिक्षक जो कहते हैं, या कम-से-कम उनके नेता जो कहते हैं, और जो वे करते हैं, इनके बीच का बेसुरापन अनेक रूप लेता है और इसके कई महत्त्वपूर्ण परिणाम होते हैं।

कुछ के लिए, यह आदर्शवादियों की चेतावनियों और नई तथा कथित रूप से क्रांतिकारी पद्धतियों के पक्षधरों के प्रति एक निंदक (cynical) दृष्टिकोण के विकास की नींव रखता है। यह निंदा-भाव, जो एक पूर्व मोहभंग (disillusionment) से उपजता है, अनेक युवा शिक्षकों को तब घेरता है जब वे अपने व्यावसायिक प्रशिक्षण के दौरान जगाई गई कई अपेक्षाओं के अवास्तविक स्वरूप को समझने लगते हैं। जैसा शिक्षण वास्तव में अनुभव होता है, और जैसा पाठ्यपुस्तकों और महाविद्यालयी पाठ्यक्रमों में वर्णित होता है, वे प्रायः दो बहुत भिन्न स्थितियाँ निकलती हैं।

परिणाम यह होता है कि शिक्षा के महाविद्यालयी प्रशिक्षक और अन्य बाहरी लोग अनेक अभ्यासकर्ताओं द्वारा संदेह से देखे जाने लगते हैं। साथी शिक्षकों का कथन भी संदेह से देखा जा सकता है जब वह श्रोता के अपने कक्षा-अनुभव से टकराता है।

शैक्षिक चर्चाओं में रटे-रटाए वाक्यांशों का प्रयोग किसे प्रकट करने की प्रवृत्ति रखता है?

Aविचार और कर्म के बीच संबंध
Bकक्षा-संदर्भों में कहने और करने के बीच का अंतर ✓ Correct
Cनारों का औपचारिक महत्त्व
Dबातचीत की आदर्शवादी झंकार
Correct answer: (B) कक्षा-संदर्भों में कहने और करने के बीच का अंतर
Explanation

रटे-रटाए वाक्यांश कक्षा में कहने और करने के बीच के अंतर को प्रकट करते हैं, अतः यही उत्तर है।

गद्यांश कहता है कि ऐसे वाक्यांश विचार और कर्म के बीच एक क्षीण संबंध का संदेह जगाते हैं।

यह पूछता है कि इन अवधारणाओं को दिया गया ज़ुबानी सम्मान कक्षाओं में वास्तव में जो होता है उससे जुड़ता है या नहीं।

अतः ये वाक्यांश कहने और करने के बीच की खाई उजागर करते हैं।

ये विचार और कर्म के बीच दृढ़ संबंध नहीं दर्शाते; वे उस पर संदेह डालते हैं।

औपचारिक महत्त्व और आदर्शवादी झंकार केवल विशेषताएँ हैं, अतः उत्तर कहने और करने के बीच का अंतर है।

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