ज्ञान दो प्रकार के होते हैं; अनुभव, साक्ष्य से प्राप्त, जो सत्य (जब वह प्रमा हो) और असत्य दोनों हो सकता है किन्तु जो सदैव कुछ नया हो और पूर्व में अप्राप्त हो, तथा स्मृति अथवा स्मरण ज्ञान, जो कुछ नया नहीं है। उसी वस्तु के सतत परिज्ञान में एक एकल अपरिवर्तनशील प्रदर्शन होता है जो सम्मिलित आत्म (स्वयं) के रूप से प्रकाशित होता है। इस प्रकार के सतत निश्चित परिज्ञान (प्रदर्शन से पृथक रूप में) का अंत हो जाता है जब सशक्त साक्ष्य पर आधारित अन्य परिज्ञान द्वारा यह व्याघाती हो जाता है।
प्रदर्शन की सततता का सिद्धांत वेदांत के विशिष्ट यथार्थवाद, जो अमूर्त विचार के प्रत्येक स्तर के लिए एक अंतर्बोध-निरंतरता की मांग करता है, के अनुरूप ठीक बैठता है। एक प्रदर्शन एवं एक प्रत्यय के मध्य तादात्म्य के आवश्यक विचार का अपना आधार कुछ यथार्थ माध्यम में प्रदर्शन की निरंतरता में होता होगा।
इसके अतिरिक्त, जैसा कि वेदांत में ज्ञान को त्वरितता के रूप में स्वयं के दृष्टिकोण से देखा गया है न कि आनुभविक दृष्टिकोण से, स्वयं (प्रदर्शन नहीं) के तार्किक कृत्य को यह निर्धारित करने के लिए लिया गया है कि परिज्ञान के एक पर्याय को कितनी अवधि तक एक एवं समान होना कहा जा सकता है; केवल जब यह व्याघाती होता है तभी इसे अनस्तित्व में होना कहा गया है।
वेदांत परिभाषा प्रमा को किस रूप में परिभाषित करता है :
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