शहरीकरण की प्रक्रिया आधुनिकीकरण अथवा धर्म निरपेक्षीकरण की शक्तियों के साथ एकपक्षीय रूप से सम्बद्ध नहीं होनी चाहिए, यद्यपि सीमित अर्थ में, जैसा कि मिल्टन सिंगर और आर. रेडफील्ड द्वारा कहा गया, महानगरीय शहरी केन्द्रों में विकास प्राथमिक (नियत-विकासीय) अवस्था से द्वितीयक (विषम-विकासीय) शहरीकरण में जाता है, पारम्परिक विद्वन्मण्डलीय पेशेवर बुद्धिजीवी वर्ग में रूपान्तरित हो सकती है, बदली हुई परिस्थितियों में जिसका कार्य परम्परा और आधुनिकता के बीच मध्यस्थता करना हो सकता है।
शहरीकरण, 'द्वितीयक' अवस्थाओं में भी महान परम्परा के संबल को सुदृढ़ कर सकता है क्योंकि संचार साधन जैसे कि यातायात, प्रेस, रेडियो, ध्वनि प्रवर्धकों आदि जिनका प्रयोग अन्यथा आधुनिक मूल्यों के प्रेषण के लिए किया जा सकता था, महान परम्परा के मूल्य-प्रणाली के प्रसार को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। संचार के तीव्रीकरण में प्रत्येक चरण का आशय इस प्रकार न केवल आधुनिकता के लिए लाभकारी है, परन्तु समान रूप से अथवा समान से भी अधिक रूप से महान परम्परा के पुनर्बलन के हेतु भी लाभकारी है।
परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और पुनर्निर्माण महान परम्परा के लिए प्रासंगिक है। उनकी सार्थकता विषयात्मक और प्रसंगात्मक दोनों तरह से है। सांस्कृतिक परिवर्तन की एक प्रक्रिया के रूप में संस्कृतिकरण का प्राथमिक रूप से प्रसंगात्मक महत्त्व है; यह मूलतः विशिष्टतावादी है और इसलिए लघु परम्परा के अंतर्गत आता है, और सर्वोपरि सांस्कृतिक परिवर्तन में इन्द्रियानुभविक प्रक्रिया का वर्णन करता है जो सर्वाधिक व्यापक रहा है।
संस्कृतिकरण की विशेषताएँ क्या हैं?
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