तकनीकी का दर्शन दर्शनशास्त्र की वह शाखा है जो कि समाज एवम् मानवीय जीवन पर तकनीक के स्वभाव, विकास एवं प्रभाव का परीक्षण करती है। तकनीक किस प्रकार से मानवीय मूल्यों एवं व्यवहारों को प्रभावित करती है, इस क्षेत्र में इसके विस्तार से उत्पन्न हुए नैतिक, सामाजिक एवं अस्तित्वपरक प्रश्नों को समझने का प्रयास किया जाता है।
तकनीकी के दर्शन का एक महत्वपूर्ण विचारबिन्दु मानव एवं तकनीक का अंतर्संबंध रहा है। दर्शनशास्त्री इस पर चर्चा करते ही रहते हैं कि तकनीक अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मनुष्यों के द्वारा प्रयुक्त एक निष्पक्ष उपकरण है या फिर यह मानवीय व्यवहार एवं समाज को आकार प्रदान करता है। साधनतावादी दृष्टिकोण के अनुसार तकनीक किसी साध्य के लिए साधन होती है, जिसमें तकनीकी उपकरणों पर मानवीय नियंत्रण पर बल दिया जाता है। इसके विपरीत, नियतिवादी दृष्टिकोण का तर्क यह रहा है कि तकनीक का अपना तर्क एवं गति होती है, जिसका मानवीय व्यवहार एवं सामाजिक संरचना पर अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। तकनीकी के दर्शन का एक अन्य आलोचनात्मक पक्ष इसका तकनीकी नवाचार पर नैतिक प्रभाव भी रहा है, क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमता (AI) एवं मशीन-अधिगम के उदय ने स्वायत्तता, उत्तरदायित्व एवं पक्षपातपूर्ण निर्णय-निर्माण पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।
यहाँ तकनीकी मध्यस्थता की अवधारणा भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें मानवीय प्रत्यक्ष एवं जगत से इसके अंतर्संबंध के तरीकों का वर्णन मिलता है। उदाहरणार्थ, लोगों के संप्रेषण, संबंध-निर्माण एवं यथार्थ ज्ञान को किस प्रकार स्मार्टफोन एवं सोशल मीडिया के माध्यमों ने बदलकर रख दिया है।
तकनीकी का दर्शन तकनीकी दिवास्वप्नों एवं दुःस्वप्नों की अवधारणा को भी संबोधित करता है। दिवास्वप्रीय दृष्टिकोण सकारात्मक परिवर्तन के बल स्वरूप तकनीक को देखता है। दूसरी ओर, दुःस्वप्रीय दृष्टिकोण अनियंत्रित तकनीकी प्रगति, जैसे कि निजता के अभाव, अमानवीयकरण एवं पर्यावरण-क्षय जैसे संभावित खतरों एवं नकारात्मक परिणामों से आगाह भी करता है।
तकनीक का दुःस्वप्रीय दृष्टिकोण किस बात से आगाह करता है?
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