'स्वयं को जानने' की अस्पष्ट अवधारणा का "अपने आप का ध्यान रखना" की धारणा के रूप में परिवर्तित हो जाने के अनेक कारण हैं। हम अपने आप का ही ध्यान रखने के लिए अधिक प्रवृत्त होने को अनैतिक मानते हैं, जो कि सभी संभावित नियमों से दूर ले जाने का साधन मात्र है। इस क्रम में हम ईसाई नैतिकता की परंपरा का अवधान करते हैं जिसमें आत्म-त्याग को मोक्ष की शर्त माना जाता है। अपने आप को जानना (आत्म-ज्ञान), विरोधस्वरूप आत्म-त्याग का साधन है। साथ ही हम एक धर्म-निरपेक्ष परंपरा का भी अवधान करते हैं, जो बाह्य सिद्धांत को नैतिकता का आधार मानता है।
इस प्रकार, आत्म मुग्धता नैतिकता का आधार कैसे हो सकती है, जो दूसरों के साथ स्वीकार्य व्यवहार के लिए नियमों की मांग करते हैं। 16 वीं शताब्दी से ही, आत्म बोध और आत्म ज्ञान के महत्त्व के नाम पर स्थापित नैतिकता की आलोचना की जाती रही है। अतः आत्मानुरक्षण (स्वयं की देख-रेख) को नैतिकता के समान मान्यता देना कठिन प्रतीत होता है। "स्वयं को जानो" द्वारा "अपना ध्यान रखो" के अस्पष्ट अवबोधन का कारण यह है कि हमारी नैतिकता वैराग्यवाद की नैतिकता है, जिसमें आत्म बोध उसको माना जाता है, जहाँ स्वयं का त्याग किया जाता है।
सारांश रूप में, "अपना ध्यान रखो" और "अपने आप को जानो" के पुरातन दो सिद्धांतों के अनुक्रम में व्यतिरेक रहा है। ग्रीक-रोमन संस्कृति में, अपने आप का बोध या ज्ञान आत्मानुरक्षण का परिणाम है। आधुनिक युग में, आत्मज्ञान का अभिप्राय 'मौलिक सिद्धांत' में व्याप्त सिद्धांत से है।
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