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भारत की संघीय संसद, देश का सर्वोच्च विधायी निकाय, अपनी द्विसदनीय संरचना से अभिलक्षित है, जिसमें लोकसभा (House of the People) और राज्यसभा (Council of States) सम्मिलित हैं। यह संरचना विधान पर दूसरी दृष्टि को सुगम बनाती है और संघ के स्तर पर राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है। संसद की भूमिका और कार्यप्रणाली बहुआयामी है, जो केवल विधि-निर्माण से आगे जाती है। इसकी प्रमुख भूमिका विधायी है, जिसमें विधेयकों पर विचार-विमर्श और उन्हें पारित करना सम्मिलित है। एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य वित्तीय है, क्योंकि यह बजट प्रक्रिया और व्यय के प्राधिकरण के माध्यम से सरकार के वित्त पर नियंत्रण रखती है। इसके अतिरिक्त, संसद एक महत्वपूर्ण कार्यपालिका पर्यवेक्षण कार्य करती है, जो प्रश्नकाल, प्रस्तावों और बहसों जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से सरकार को जवाबदेह ठहराती है। अपने विस्तृत और जटिल कार्यभार को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने के लिए, संसद संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) की एक प्रणाली पर बहुत निर्भर करती है। ये समितियाँ, जिन्हें प्रायः 'लघु विधायिका' (miniature legislatures) कहा जाता है, ऐसे मंच हैं जहाँ विधेयकों, बजटीय अनुदानों और सार्वजनिक नीति के मामलों की विस्तृत, ग़ैर-दलगत और विशेषज्ञतापूर्ण ढंग से जाँच होती है। ये सदन की सार्वजनिक चकाचौंध से दूर मुद्दों की गहन जाँच की अनुमति देती हैं, जिससे संसदीय कार्य की गुणवत्ता और प्रभावशीलता बढ़ती है और इसका जवाबदेही कार्य सुदृढ़ होता है।

स्रोत में उजागर की गई संसदीय समितियों का प्रमुख उद्देश्य क्या है?

Aलोकसभा और राज्यसभा के कार्यों को प्रतिस्थापित करना।
Bसमस्त संसदीय कार्यवाही के प्रसारण हेतु मंच प्रदान करना।
Cसंसदीय कार्य की अधिक कुशल और गहन जाँच को सक्षम बनाना।
Dआपात काल में एक वैकल्पिक सरकार के रूप में कार्य करना।
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