सैयदों और उनके ख़ानक़ाहों को दिए गए दान, जो उनके परिवारों और अनुयायियों की सहायता हेतु थे, उन्हें भूमि पर नियंत्रण देते थे। वे सौभाग्यशाली थे कि उनके पास खेती हेतु उपजाऊ क्षेत्र थे; उन्हें इन भूमियों पर अपने शिष्यों के स्वैच्छिक श्रम से, और अपने क्षेत्र के किसानों व कारीगरों के उपज-उपहारों से आय होती थी। शिष्यों के अवैतनिक श्रम से उन्होंने बड़ी संपत्ति अर्जित की। समय के साथ धार्मिक और लौकिक अनुदानों की व्यवस्था, और अनुदान-धारकों के अधीन किसानों व कारीगरों के अधीनीकरण ने घाटी के भीतर सामाजिक व्यवस्था को परिभाषित किया। उनके अनुदानों ने सैयदों को यथासमय अपने उत्तराधिकारियों को स्थायी प्रशासक नियुक्त करने में सक्षम बनाया। धीरे-धीरे सैयदों ने अपने ख़ानक़ाहों और संपदाओं का सार्वजनिक स्वरूप बनाने हेतु, कम-से-कम बाह्य अनुरूपता के साथ, स्थानीय परंपराएँ अपनाईं। उनके दान सुल्तानों और उनके अधिकारियों की वसूली से मुक्त थे। यद्यपि इन संपदाओं पर संबंध को यूरोपीय अर्थ में सामंती नहीं कहा जा सकता, श्रम-शक्ति के उपयोग पर अनेक बाधाएँ थीं। राज्य ने इस अर्थ में सामंती स्वरूप ग्रहण किया कि वह मुख्यतः धार्मिक और लौकिक तत्वों द्वारा अधिशेष-निष्कासन का साधन था, और उप-सामंतीकरण की प्रक्रिया को नहीं रोकता था।
सैयदों ने अपने ख़ानक़ाहों की सामाजिक स्वीकार्यता बनाने हेतु क्या कदम उठाए?
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