राज्य के नीति-निदेशक तत्व न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं। इनके पीछे की स्वीकृति राजनीतिक है। जैसा डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा, 'यदि कोई सरकार इनकी उपेक्षा करती है, तो उसे चुनाव के समय मतदाताओं के समक्ष इनका उत्तर अवश्य देना होगा'। नीति-निदेशक तत्व संविधान का अंग हैं। अनुच्छेद 37 स्पष्ट रूप से कहता है कि 'विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा'। अतः संघ को यह अधिकार होना चाहिए कि वह विशेष राज्यों को बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा (अनुच्छेद 45), गोवध रोकने (अनुच्छेद 48) और मद्य-निषेध (अनुच्छेद 47) के निर्देश दे। संघ द्वारा दिए ऐसे निर्देशों का पालन न करने पर वह ऐसे अड़ियल राज्य के विरुद्ध अनुच्छेद 365 लागू कर सकता है। सर आइवर जेनिंग्स (Ivor Jennings) ने नीति-निदेशक तत्वों को 'पवित्र अभिलाषा' (Pious Aspiration) कहा और 19वीं सदी के 'समाजवाद के बिना फेबियन समाजवाद' (Fabian Socialism without Socialism) के अंग्रेज़ी दर्शन को भारत में लाने की उपयोगिता पर भी प्रश्न उठाया। ग्रैनविल ऑस्टिन (Granville Austin) इन निदेशों को 'सामाजिक क्रांति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने वाला' मानते हैं। भाग चार में निहित निदेशों के अतिरिक्त, संविधान के अन्य भागों में भी राज्य को संबोधित कुछ निदेश हैं। अनुच्छेद 350क प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकरण को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण की पर्याप्त सुविधा देने का आदेश देता है। अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के प्रसार को बढ़ावा देने का आदेश देता है। ये निदेश नीति-निदेशक तत्वों का अंग नहीं हैं, पर उन्हीं के समान महत्व रखते हैं।
संविधान के 86वें संशोधन के माध्यम से नीति-निदेशक तत्वों का कौन-सा अनुच्छेद मूल अधिकारों में लाया गया?
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