भारत में नौकरशाही समाज के आधुनिकीकरण और एक सहमति-आधारित मानकीय व्यवस्था के विकास के लिए सबसे संरचनात्मक आधार प्रस्तुत करती है। निस्संदेह यह आंतरिक सांस्कृतिक तनावों से ग्रस्त है; ये तनाव नौकरशाहों की अंतर-संरचनात्मक भागीदारी में भूमिका-संघर्ष से उत्पन्न होते हैं; उसका परिवारवादी, जाति और नातेदारी-उन्मुख विशिष्टतावाद उसकी नौकरशाही भूमिकाओं की सार्वभौमिकता की विचारधारा से टकरा सकता है; उसकी व्यक्तिगत निष्ठाएँ उसके पद की वैधानिक अनामिकता और अमूर्तता को काट सकती हैं।
किंतु इन खतरों को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर आँका गया है, इस मिथ्या विश्वास पर कि ये केवल भारतीय समाज की कम विकसित और परंपरागत प्रकृति से उत्पन्न होते हैं; गहराई से देखने पर अनेक दुष्क्रियाएँ शक्ति की परिघटना तथा समूहों और वर्गों के सापेक्ष अभाव से जुड़ी प्रतीत होती हैं। इस रूप में नौकरशाही की ऐसी दुष्क्रियाएँ पश्चिमी समाजों में विद्यमान दुष्क्रियाओं के तुलनीय हो सकती हैं।
यह उस मिथ्या धारणा से भी उपजती है कि क्रियात्मक रूप से समतुल्य प्रक्रियाओं या परिणामों के लिए हर जगह संरचनात्मक रूप से समान विकास होना चाहिए। यह परंपरागत समाजों के आधुनिकीकरण पर होने वाले अधिकांश चिंतन में एक प्रचलित भ्रांति है।
निम्नलिखित में से कौन सी संस्था भारतीय समाज में स्थिर संरचनात्मक आधार और मानकीय व्यवस्था का विकास प्रदान करती है?
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