नवयथार्थवादियों और नवउदारवादियों के बीच की बहस 1970 के दशक में उभरी और अगले दो दशकों में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के भीतर प्रमुख सैद्धांतिक विवाद बन गई। वॉल्ट्ज़ ने स्वयं अपनी कृति 'मैन, द स्टेट एंड वॉर' (Man, the State and War, 1959) से यथार्थवाद के शास्त्रीय स्तर में योगदान दिया, जिसने मॉर्गनथाऊ और कार के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विवेचन को अराजकता में फँसे राज्यों के बीच संघर्षों की अनवरत शृंखला के रूप में वर्णित किया। बीस वर्ष बाद वॉल्ट्ज़ ने अपनी 'थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स' (Theory of International Politics, 1979) प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने युद्ध के कारणों की व्याख्या करने का प्रयास किया। संरचनात्मक यथार्थवाद शक्ति-संतुलन की अवधारणा में व्यक्त होता है। यह वह व्यवस्था है जिस पर हमें ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि इसकी घटक इकाइयाँ व्यवस्था में समान प्रकार्य निभाती हैं, चाहे वे कहीं भी स्थित हों, उनकी विचारधारा और संस्कृति कुछ भी हो। वॉल्ट्ज़ तर्क देते हैं कि द्विध्रुवीय व्यवस्थाएँ बहुध्रुवीय व्यवस्थाओं की तुलना में अधिक स्थिर होती हैं। उनके अनुसार अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में व्यवस्था का विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
कौन यथार्थवादी नहीं है?
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