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सुकरात : आइए हम इस विषय पर इस प्रकार विचार करते हैं : यदि कोई व्यक्ति लारिस्सा या किसी अन्य स्थान का रास्ता जानता है और वह वहां जाता है, तो क्या हम उसे एक सही और अच्छा गाइड कहेंगे। मेनो : बिल्कुल कहेंगे। सुकरात : और एक ऐसा व्यक्ति है जिसका रास्ते के बारे में सही अभिमत है, लेकिन वह कभी वहाँ गया नहीं है, तो क्या वह भी एक अच्छा गाइड नहीं हो सकता? मेनो : बिल्कुल हो सकता है।

सुकरात : तब सही अभिमत ज्ञान के समान सही कार्य के लिए अच्छा गाइड हो सकता है। और जिस व्यक्ति का सही अभिमत है वह उतना ही अच्छा गाइड होगा जितना ज्ञानवान व्यक्ति। मेनो : यह सही लग रहा है। सुकरात : सही अभिमत ज्ञान से कम उपयोगी नहीं है। मेनो : सही बात है।

सुकरात : लेकिन सही अभिमत जब तक रहता है तब तक सही काम करता है। लेकिन ये अभिमत लम्बे समय तक नहीं रहते हैं। वे मनुष्य के मन से निकल जाते हैं, इसलिए उनका तब तक कोई महत्त्व नहीं है जब तक कि उन्हें तर्क बुद्धि द्वारा स्थायित्व न प्रदान किया जाए। स्थायित्व प्रदान करने की यह क्रिया ‘स्मरण’ कहलाती है और जब वे स्थायी हो जाते हैं तो ज्ञान बन जाते हैं। मेनो : मैं समझ गया।

सुकरात : इसलिए हमें कहना चाहिए कि ज्ञान उपयोगिता की दृष्टि से नहीं बल्कि स्थायित्व की दृष्टि से अभिमत से भिन्न होता है। मेनो : सही कहा, सुकरात। सुकरात : तब केवल अभिमत रखने वाले व्यक्ति की तुलना में ज्ञानवान् व्यक्ति अधिक स्थिर और विश्वसनीय होता है, भले ही वे दोनों सही रास्ता दिखाएं।

सही अभिमत के ज्ञान की तुलना में कम मूल्यवान क्यों माना जाता है?

Aयह कमजोर पड़ जाता है या मन से निकल जाता है।
Bइसका पता लगाना कठिन है।
Cयह असत्य विचारों पर आधारित होता है।
Dयह बुरे शिक्षकों से प्राप्त होता है।
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