संप्रेषण हेतु भाषा किसकी उपज है?
संप्रेषण हेतु भाषा रोज़मर्रा के जीवन की उपज है, जो साथ रहते और काम करते लोगों के सामान्य आदान-प्रदान से पनपती है।
यह दैनिक प्रयोग में गढ़ी जाती है, जहाँ अर्थ साझा अनुभव के माध्यम से तय, परखे और आगे बढ़ाए जाते हैं, न कि उससे अलग निर्मित किए जाते।
इसे प्रयोगशाला अनुकरण की उपज कहना गलत है, क्योंकि भाषा नियंत्रित प्रयोग में अभियंत्रित नहीं होती बल्कि जिए हुए संपर्क में उठती है।
इसे धार्मिक संबद्धताओं तक ले जाना एक पूरे समाज के साझा उपकरण को मान्यता के एक क्षेत्र तक संकुचित कर देता है।
इसे अभिजात वरीयता मानना यह नकारता है कि भाषा सामान्य बहुसंख्या की है, किसी विशेषाधिकार-प्राप्त अल्पसंख्या की नहीं।
वायगोत्स्की का यह मत कि प्रतीक सामाजिक संदर्भ में सीखे जाते हैं, भाषा के इस रोज़मर्रा सामुदायिक जीवन में जड़ाव को रेखांकित करता है।
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