अतीत की स्मृति मनुष्य के लिए स्वाभाविक आकर्षण है। अर्थपरायण लाख कहा करें कि गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा पर हृदय नहीं मानता, बार बार अतीत की ओर जाता है, अपनी यह बुरी आदत नहीं छोड़ता। इसमें कुछ रहस्य अवश्य है।
हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति लोक है जहाँ वह अनेक प्रकार के बंधनों से छूटा रहता है और अपने शुद्ध रूप में विचरता है। वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है, अतीत बीच बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है, आगे तो बराबर खिसकता हुआ दुर्भेद्य परदा रहता है।
बीती बिसारने वाले आगे की सुध रखने का दावा किया करें, परिणाम अशांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वर्तमान को संभालने और आगे की सुध रखने वाले संसार में जितने अधिक होते हैं, संघशक्ति के प्रभाव से जीवन की उलझन उतनी ही बढ़ती जाती है।
बीता बिसारने का अभिप्राय है जीवन की अखंडता और व्यापकता की अनुभूति का विसर्जन, सहृदयता और भावुकता का भंग, केवल अर्थ की निष्ठुर क्रीड़ा।
अशांति किसका परिणाम है?
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